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लता-कस्तूरी की खेती

Kisan help - 3 March 2019 - 7:38pm

   

   हम सभी जानते हैं कि कस्तूरी हिमालय में पाये जाने वाले एक विशेष प्रकार के हिरण की नाभि से प्राप्त होती है। कस्तूरी का प्रयोग आदि काल से बतौर औषधि और इत्रा में होता रहा है। सारी दुनिया इसकी खुशबू की दिवानी है। इस दिवानेपन के कारण जब इस कस्तूरी की प्राप्ति के लिए इन हिरणों का बड़े पैमाने पर शिकार आरंभ हुआ तो उनकी संख्या घटने लगी। आज ये विलुप्तता के कगार पर खड़े हैं। अब इनसे कस्तूरी के एकत्रण पर प्रतिबंध लग गया है। यद्यपि इन हिरणों के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास किये जा रहे हैं पर ये उतने सफल नहीं है। जब भी इस तरह मूल औषधीयों की कमी पड़ती हैं तो बाजार रूकता नहीं है और जल्दी ही इनके विकल्पों की खोज आरंभ हो जाती है। यूं तो वैज्ञानिकों और उद्यमियों ने बहुत से पौधों में कस्तूरी की गंध प्राप्त की पर व्यवसायिक दृष्टि से कस्तूरी भिण्डी का नाम ही सामने आया। भिण्डी को हम सब्जी की फसल के रूप में अच्छे से जानते हैं। भारतीय वनों में कई प्रकार की जंगली भिण्डियाँ उगती हैं। जिनमें से सभी का प्रयोग औषधि और अन्य व्यवसायिक कार्यों में होता है। उदाहरण के लिए वन भिण्डी का उपयोग गुड बनाते समय अशुद्धियों को साफ करते समय होता है। बहुत तरह की भिण्डियां ग्रामीण और वनीय क्षेत्रो में साग के रूप में खाई जाती है जबकि फलियों का प्रयोग कच्चे रूप में ही नाश्ते के रूप में होता है। भारतीय वनों में कस्तूरी भिण्डी भी जंगली प्रजाति के रूप में पाई जाती है। है के स्थान पर थी का प्रयोग ज्यादा उचित जान पड़ता है। अत्यधिक दोहन के कारण अब वनों में इसे आसानी से प्राप्त कर पाना संभव नहीं जान पड़ता है। कस्तूरी भिण्डी की बढ़ती मांग और वनों में इसकी घटतीउपलब्धता ने  विशेषज्ञों को इसे एक उपयोगी औषधि एवं सगंध फसल के रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया। इस पर व्यापक अनुसंधान किये गये और इसकी कृषि की उन्नत तकनीके विकसित की गई। आमतौर पर कस्तूरी भिण्डी के बीजों का प्रयोग कस्तूरी के वैकल्पिक श्रोत के रूप में किया जाता है

अन्य नाम       : कसतूरी भिंडी, मुश्क दाना

जलवायु
उष्ण क्षेत्रों में पाया जाता है जलभराव व पालामुक्त क्षेत्र उपयुक्त हैं।

मृदा
सभी प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है।

प्राप्ति स्थान: यह व्यावसायिक स्तर पर बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थाल व गुजरात राज्यों में उगाया जाता है।
पादप विवरण : इसका पौधा 4-5 फीट ऊँचा बहुवर्षीय झाड़ीनुमा होता है। इसकी पत्तियों और तने पर रोयें होते है। पत्तियों की चौड़ाई 8-10 से.मी. होती है। फूल पीले रंग के होते है तथा फल भिंडी के आकार के होते है और बीज काले रंग के कस्तूरी की गंध लिए होते है।
मुख्य रसायनिक संघटक एवं उपयोग : मुश्कदाना के बीज में सुगन्धित तेल पाया जाता है। इसमें बीज में एम्ब्रेटोलाइट तथा फार्निसोल नामक रसायन क्रमशः 0.03 एवं 0.12 प्रतिशत होते हैं। इसका उपयोग तंबाकू, जर्दा, इत्र, क्रीम, पाउडर में होता है तथा बीज का उपयोग मूत्र रोग, पेट रोग, स्नायविक कमजोरी एवं गुप्त रोगों की दवा बनाने में होता है।

खेत की तैयारी एवं बुबाई
वर्षा ऋतु से पूर्व खेत की तीन जुताई कर ली जाती है।
बोआई/रोपण विधिः बीज को लाइन से लाइन की दूरी 60 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दूरी के अनुसार बोया जाता है। प्रति हैक्टर 8 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है।
प्रर्वधनः फसल की बोआई बीज द्वारा की जाती है।इसमें लाभकारी सूक्ष्म जीवों को चूर्ण के रूप में मिश्रित भी किया जा सकता है। कस्तूरी भिण्डी की फसल में समय-समय पर अनावश्यक खरपतवारों को उखाड़ने की आवश्यकता होती है। इसमें खरपतवार नाशियों का उपयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें हाथ सेउखाड़ा जाता यांत्रिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। जोकि बहुत मंहगी साबित होती है। आम तौर पर हर 10 से 15 दिनों के अंतराल में खरपतवारों को उखाड़ने की आवश्यकता होती है।
 खाद
कस्तूरी भिण्डी की खेती बिना किसी समझौते के जैविक विधि से ही की जानी चाहिए। आप जानते ही है कि भिण्डी की फसल में नाना प्रकार के कीटों और रोगों का आक्रमण होता है। भिण्डी उत्पादक तो आधुनिक कृषि रसायनों का प्रयोग कर इन पर नियंत्राण प्राप्त कर लेते हैं। पर कस्तूरी भिण्डी की खेतमें यह संभव नहीं हो पाता है। आधुनिक रसायनों के प्रयोग से कीट और रोग नियंत्रिात तो हो जाते हैं पर कस्तूरी भिण्डी के बीज अपनी स्वभाविक गंध खो बैठते हैं जिसके कारण इनका बाजार मूल्य कम हो जाता है। वर्षा ऋतु मे भूमि में 25 क्विंटल गोबर की खाद एवं २ किलो ग्राम  नीम की खल 2 किलो ग्राम अरण्डी की खल मिला देनी चाहिए  । इस में रासायनिक खाद की आवश्यकता नही होती है 

सिचाई प्रबंधन
सिचाई
वर्षा ऋतु की फसल होने के कारण सिंचाई की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। वर्षाकाल में निराई-गुड़ा़ई लाभकारी है।

कीट प्रबंधन
कीट 
तना काटने वाले कीट हेतु  नीम  का  काढ़ा ५ लीटर 10 लीटर गौ मूत्र 2०० लीटर  पानी में मिलाकर   छिड़काव  प्रति एकड़ समय-समय पर करते रहना चाहिये।

फसल कटाई
बोआई के 5-7 माह पश्चात्‌ भिन्डी के समान ही इसके पके हुये 'कैप्सूल' को तोड़ कर सुखाते रहते हैं और अन्त में पटक कर बीज को निकाल कर सुखाने के बाद प्लास्टिक की थैलियों में भरकर संग्रहित कर लेते हैं।
उपजः- प्रति हैक्टर 18-20 क्विंटल सूखा बीज प्राप्त होता है।

कटाई के बाद की क्रियाऐं
सिंचित अवस्था में जैविक खेती से 9 से 10 क्वि0 की उपज प्राप्त होती है। यद्यपि बीजों से एम्ब्रेट आईल निकालना कठिन नहीं है परन्तु फिर भी आमतौर पर किसान खेती तक ही सीमित रहना चाहते हैं। वे बीजों को छोटे व्यापारियों के पास बेच देते हैं जिनसे बीज कई माध्यमों से बड़े शहरों केव्यापारियों तक पहुंच जाते हैं। इससे किसानों को अधिक कीमत नहीं मिल पाती है। यदि समर्पित गैर सरकारी या सरकारी संगठन सामने आयें और कस्तूरी भिण्डी उत्पादक, और नव उद्यमियों को प्रसंस्करण इकाईयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करें तो निश्चित ही नव उद्यमियों और किसानों दोनों को बहुत अधिक लाभ हो सकता है।
          बतौर वनस्पति विशेषज्ञ मैं कस्तूरी भिण्डी का भविष्य उज्जवल मानता हूँ क्योंकि अभी तक इसके सरल विकल्पों की तलाश नहीं हो पाई है। कस्तूरी का बाजार कस्तूरी भिण्डी के इर्द-गिर्द ही बना हुआ है। फलस्वरूप इसकी लगातार मांग बनी हुई है। किसान भाईयों को चाहिये कि शीघ्र ही इसकी खेती के गुर सीखे और जैविक विधि से उत्पादन आरंभ करें।

भंडारण 
पूर्ण रूप से पके हुए बीजों को धूप में सुखकर बोरों में भरकर कम नमी वाले स्थान पर भंडारित करते है।
उत्पाद का वैकल्पिक उपयोग एवं मूल्य संवर्द्धन
अनुमानित विक्रय मूल्य 
लगभग रु. 40 प्रति कि.ग्रा. बीज

organic farming: कसतूरीभिंडीजैविक खेती: औषधिagricare: जैविक खाद

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि किन किन किसानों को मिलेगा सम्मान

Kisan help - 28 February 2019 - 5:58pm

 

वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने 2019-20 के अंतरिम बजट में छोटे और सीमान्त किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम- किसान) योजना की घोषणा की है। इस योजना का लाभ दो हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों को मिलेगा। योजना के तहत 6,000 रुपये छोटे किसानों के खातों में तीन किस्तों में डाले जाएंगे। आपको बताते हैं कि इस योजना का लाभ किन लोगों को नहीं मिलेगा...

पीएम किसान स्कीम के फायदे 
इस स्कीम के तहत सरकार 2 हेक्टेयर तक की खेतिहर जमीन वाले 12 करोड़ किसान परिवारों को 6,000 रुपये हर साल देगी। ये पैसे हर चार महीने पर 2,000 रुपये की किश्त में साल में तीन बार दिए जाएंगे। इन पैसों को फायदा पाने वाले किसान के खाते में सीधे ट्रांसफर कर दिया जाएगा। पहली किस्त की अवधि 12 दिसंबर, 2018 से 31 मार्च, 2019 है। यानी किसानों को इस स्कीम का फायदा मौजूदा वित्तीय तिमाही से ही मिलने लगेगा। 

किसे मिलेगा इस स्कीम का फायदा? 
उन सभी किसान परिवारों को इस स्कीम का फायदा मिलेगा जिनके पास दो हेक्टेयर तक खेतिहर जमीन है। 1 फरवरी, 2019 तक जिन किसानों के नाम राज्य के लैंड रिकॉर्ड्स में दिखेंगे, उन्हें इस स्कीम का फायदा मिलेगा। सरकारी कर्मचारियों की बात करें तो मल्टी-टास्किंग स्टाफ/क्लास IV/ग्रुप डी कर्मचारी इस स्कीम का फायदा ले पाएंगे। 

किसे नहीं मिलेगा इस स्कीम का फायदा? 

 

सेवारत या सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों, मौजूदा या पूर्व सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।

पेशेवर निकायों के पास पंजीकृत चिकित्सकों, इंजिनियरों, वकीलों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और वास्तुकारों और उनके परिवार के लोग भी पीएम किसान योजना का लाभ उठाने के पात्र नहीं होंगे।

 

सभी वयोवृद्ध/रिटायर्ड पेंशनर जिन्हें 10,000 रुपये या इससे ज्यादा की पेंशन मिलती है, वे भी पीएम किसान योजना का फायदा नहीं ले पाएंगे।

आयकर देने वाले परिवारों को भी खासतौर पर छोटे किसानों के लिए लॉन्च की गई इस योजना का फायदा नहीं मिलेगा।

संस्थागत भूमि मालिकों को भी लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के मौजूदा या सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अलावा स्थानीय निकायों के नियमित कर्मचारियों (इसमें मल्टी टास्किंग कम्रचारी-श्रेणी चार-समूह डी के कर्मचारी शामिल नहीं हैं) को भी इस योजना का फायदा नहीं मिल सकेगा।

दिशानिर्देश में यह भी बताया गया है कि भूमि सीमा को पूरा करने के बावजूद कुछ श्रेणी के लोग इस नकदी समर्थन के पात्र नहीं होंगे। इस योजना के तहत सरकार पहली किस्त 31 मार्च से पहले जारी करेगी। पहली किस्त प्राप्त करने के लिए आधार नंबर जरूरी नहीं है, लेकिन दूसरी किस्त से यह अनिवार्य होगा।

दिशानिर्देशों में छोटे और सीमान्त किसानों को ऐसे किसान परिवार के रूप में परिभाषित किया गया है जिनमें पति, पत्नी और नाबालिग बच्चों के पास संबंधित राज्य या संघ शासित प्रदेश के भूमि रेकॉर्ड के अनुसार सामूहिक रूप से खेती योग्य भूमि दो हेक्टेयर अथवा इससे कम है।

Tags: किसान .किसान हैल्पकिसान सम्मान निधि

पीएम किसान योजना में अब तक 2 करोड़ किसानों के रजिस्ट्रेशन, कांग्रेस शासित राज्य और प. बंगाल को योजना पर बेरुखी

Kisan help - 23 February 2019 - 2:40pm

किसान सम्मान निधि के लिए 20 फरवरी तक 2 करोड़ से ज्यादा किसानों के रजिस्ट्रेशन किए जा चुके हैं। इनमें से ज्यादातर किसान बीजेपी शासित राज्यों के हैं। योजना के तहत छोटे एवं सीमांत किसानों को सालना 6 हजार रुपये मिलने हैं। हालांकि, उन राज्यों के किसानों के पौ बारह होने वाले हैं जिनकी सरकारों ने पहले से ही इस तरह की योजना चला रखी है। इनमें आंध्र प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्य शामिल हैं। 

पीएम किसान सम्मान निधि के लिए 20 फरवरी तक 2 करोड़ से ज्यादा किसानों के रजिस्ट्रेशन किए जा चुके हैं। इनमें से ज्यादातर किसान बीजेपी शासित राज्यों के हैं। योजना के तहत छोटे एवं सीमांत किसानों को सालना 6 हजार रुपये मिलने हैं। हालांकि, उन राज्यों के किसानों के पौ बारह होने वाले हैं जिनकी सरकारों ने पहले से ही इस तरह की योजना चला रखी है। इनमें आंध्र प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्य शामिल हैं। 

दूसरी तरफ स्थिति यह है कि ज्यादातर कांग्रेस शासित राज्यों एवं पश्चिम बंगाल ने या तो बहुत कम संख्या में किसानों के नाम इस योजना के लिए भेजे हैं या फिर उन्होंने पीएम किसान वेब पोर्टल पर किसानों के डेटा अपलोड किए ही नहीं हैं। ऐसे में इन राज्यों के किसानों को मायूसी हाथ लग सकती है। यानी, देश में कुछ किसान दोहरे फायदे में रहने वाले हैं कुछ राज्यों के ज्यादातर किसान केंद्र की इस योजना से महरूम रह सकते हैं। 

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 फरवरी को योजना का उद्घाटन करेंगे। उस दिन करीब 55 लाख किसानों के खाते में 2-2 हजार रुपये की पहली किस्त चली जाएगी। योजना के तहत 2 हेक्टेयर तक की कृषि भूमि वाले करीब 12 करोड़ किसानों को हर साल तीन किस्तों में छह हजार रुपये दिए जाएंगे।  

इन राज्यों के किसानों को विशेष लाभ 
तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के किसानों को पीए किसान योजना से दोहरा फायदा होने वाला है क्योंकि वहां की सरकारें पहले से ही इसी तरह की योजनाएं चला रही हैं। ऐसे में केंद्र सरकार से मिलने जा रही सालाना 6 हजार रु. की रकम उनके लिए बोनस के समान हो जाएगी। मसलन, आंध्र प्रदेश अपनी अन्नदाता सुखी भव स्कीम को केंद्र की पीएम किसान योजना के साथ जोड़ने जा रही जिससे वहां के हर किसान को सालाना 10 हजार रुपये मिलेंगे। खास बात यह है कि योजना के लिए 2 हेक्टेयर कृषि भूमि की शर्त भी नहीं है। यानी आंध्र प्रदेश के बड़े किसान भी हर साल 10 हजार रुपये पा सकेंगे। 

पंजीकरण में यूपी टॉप 
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कृषि ऋण माफ किया था, इसलिए उसके पास लाभार्थियों के आंकड़े पहले से ही मौजूद थे। इसी वजह से पीएम किसान योजना के लिए किसानों के आंकड़े देने में यह राज्य 71 लाख पंजीकरण के साथ लिस्ट में टॉप पर है। 20 फरवरी तक जुटाए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात से 30 लाख किसान पंजीकरण के साथ सूची में दूसरे स्थान पर है। इसी तरह, महाराष्ट्र से 29 लाख किसानों का पंजीकरण हो चुका है। झारखंड, हिमाचल प्रदेश और असम से भी अच्छी-खासी तादाद में किसान रजिस्टर्ड हो चुके हैं। 

कांग्रेस शासित राज्यों और प. बंगाल की बेरुखी 
वहीं, कांग्रेस शासित राज्यों में छत्तीसगढ़ से महज 83 किसानों के नाम केंद्र सरकार के पोर्टल पर अपलोड किए गए हैं। इनमें भी सिर्फ एक किसान का रजिस्ट्रेशन ही वैलिडेट किया गया है जबकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों में एक भी किसान का वेरिफाइड डेटा अपलोड नहीं किया गया है। यही हाल तृणमूल कांग्रेस शासित राज्य पश्चिम बंगाल का भी है। राज्य ने अब तक अपने किसानों की लिस्ट पीएम किसान पोर्टल पर अपलोड नहीं की है। 
 

अन्य दक्षिणी राज्यों में उत्साह 
कर्नाटक को छोड़ दें तो अन्य दक्षिणी राज्यों ने बड़ी संख्या में आंकड़े अपलोड किए हैं क्योंकि उनके पास पहले से ही जमीनों की विस्तृत जानकारियां हैं। इनमें तमिलनाडु ने 20 लाख, आंध्र प्रदेश ने 22 लाख जबकि तेलंगाना ने 15 लाख 30 हजार किसानों के रजिस्ट्रेशन करवा दिए हैं। 

17.70 करोड़ डेटा वेरिफाइड 
अधिकारियों ने बताया कि किसानों के खातों में पैसे चेक के माध्यम से डाले जाएंगे। इस काम से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'हालांकि 2 करोड़ से ज्यादा पंजीकरण हो चुके हैं, लेकिन 24 फरवरी को इन सबके खाते में पैसे नहीं जाएंगे। हमने अब तक 17 करोड़ 70 लाख डेटा वेरिफिकेशन का काम पूरा कर लिया है जिनमें 55 लाख किसानों को कैश ट्रांसफर किया जा सकता है। इससे पहले इनका पब्लिक फाइनैंशल मैनेजमेंट सिस्टम (पीएफएमएस) से वेलिडेशन किया जाएगा। सरकार इसी सिस्टम से डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के लाभार्थियों के बैंक खातों की जांच करती है।' 

कैसे होती है छंटनी? 
सरकार किसी लाभार्थी के खाते में कैश ट्रांसफर करने से पहले तीन चरणों में जांच करती है। अधिकारी ने बताया, 'राज्यों से डेटा अपलोड होने के बाद केंद्र सरकार पहले चरण में इनका आधार नंबर से मिलान करती है। फिर दूसरे चरण में इनका लाभार्थियों के बैंक खातों से मिलान किया जाता है। आखिरी और तीसरे चरण में ये वेरिफाइड डेटा बैंक को भेजे जाते हैं जिन्हें कैश ट्रांसफर करने से पहले आखिरी बार वेरिफिकेशन कर लेना होता है।' 

अभी और लाभार्थियों के नाम लिस्ट में जोड़े जा सकते हैं क्योंकि अन्य 58 लाख किसानों के बैंक खातों के वेरिफिकेशन की प्रक्रिया चल रही है। केंद्र सरकार ने राज्यों से 25 फरवरी तक पीए किसान पोर्टल पर किसानों के डेटा अपलोड करने को कहा है ताकि 31 मार्च तक योजना की पहली किस्त लाभार्थियों तक पहुंचा दी जाए। 

 

 

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हींग की खेती

Kisan help - 21 February 2019 - 10:19am

हींग की खपत हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत है. यह शायद थोड़ी अजीब भी है की जिस देश में हींग की खपत इतनी ज्यादा है उस देश में इसकी खेती नहीं होती और इसे दूसरे देश से आयात करना पड़ता है. वहीं हींग का बाजार भाव 35000 रुपए प्रति किलो ग्राम है.

इन देशों में होती है हींग की खेती

हिंग एक सौंफ प्रजाति का पौधा है और इसकी लम्बाई 1 से 1.5 मीटर तक होती है. इसकी खेती जिन देशों में प्रमुख तौर पर होती हैं वो है अफगानिस्तान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और ब्लूचिस्तान. कब और कहां कर सकते हैं

 

हींग की खेती

 

हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है. भारत में यह तापमान पहाड़ी क्षेत्रों में होता है और इन क्षेत्रों में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. अन्य शब्दों में कहें तो इसकी खेती के लिए न ज्यादा ठण्ड और न ही ज्यादा गर्मी की आवश्यक्ता होती है.

हींग के प्रकार और कुछ अन्य जानकारी

 

हींग मुख्य: दो प्रकार की होती हैं दुधिया सफेद जिसे काबूली सुफाइद बोला जाता है और दूसरी लाल हींग. सल्फर के मौजूद होने के कारण इसकी गंध बहुत तीखी होती है. इसके भी तीन रूप होते है टिमर्स, मास और पेस्ट. यह गोल, पतला राल शुद्ध रूप में होता है जोकि 30 मि.मि. का होता है यह भूरा और फीका पीला होता है. सफेद व पीला पानी में घुलनशील है. जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईट के रूप में बेचा जाता है.

भारत में कहां हो रही है हींग की खेती ?

 

भारत में हिंग की खेती की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति से हुई है. इंडियन कॉफी बोर्ड के सदस्य डॉ.विक्रम शर्मा और हिमाचल सरकार के वजह से संभव हो पाया है. डॉ. शर्मा ने इसके बीज को इरान और तुर्की से मंगाकर यहां इसकी बीज तैयारल की है. इसके साथ ही पहांड़ी इलाकों में रह रहे किसानों के लिए अच्छी खबर यह है की वहां के किसान आसानी से हींग की खेती कर सकते हैं. भारत में अभी तक हिंग की खेती संभव नहीं हो सकी थी या फीर यूं कहें की यहां एक ग्राम भी हिंग की उत्पादन नहीं हो सकी थी.

organic farming: हींगजैविक खेती: औषधिबागवानीमसाले

जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध

Kisan help - 15 February 2019 - 7:17pm

जल ,जंगल और जमीन को लेकर हो सकता है तीसरा विश्व युद्ध ऐसे कयास बहुत ही दिनों से लगाये जा रहे हैं लेकिन कब होगा ऐसा निश्चित रूप में कह पाना मुश्किल है।केपटाउन में पानी खत्म हो ने के बाद यह सत्य होता नजर आ रहा है कि 2040 के लगभग जब दुनिया के अधिकतर बड़े शहरों में पानी खत्म हो जाएगा और इस दौड़ में भारत के भी बहुत से शहर गिनती में हैं।

पाकिस्तान का सीमा विवाद या चीन द्वारा बार बार भारत की सीमा पर कब्जा करने के पीछे कई दिनों से मैने मनन किया कि क्या वजह हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? भारत का उत्तरी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और पानी से परिपूर्ण है।देश की सबसे ज्यादा जल प्रवाह वाली नदियां उत्तर भारत में ही हैं । देश के बड़े हिस्से में इस समय सूखे का कहर है. खेती की बात छोड़िये पीने के पानी की भी भारी किल्लत देश के कई हिस्सों में इस समय बनी हुई है ।

 

आज़ादी मिले 70 वर्ष होने के बाद भी हम सूखे और बाड़ जैसी समस्याओं से स्थायी निजात नहीं पा सके है। इसके पीछे बड़ा कारण हमारे राजनेताओं की संकुचित सोच और अक्षमता तथा नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार है। तीसरे विश्व युद्ध से पहले गृह युद्ध आपने नासिक में गोदावरी तट पर मौजूद पवित्र रामकुंड के बारे में तो जरूर सुना होगा। ऐसी मान्यता है कि वनवास के दौरान राम और सीता ने यहीं स्नान किया था । हर साल यहां गुड़ी पड़वा पर्व के मौके पर हजारों श्रद्धालु पवित्र डुबकी के लिए यहां जुटते हैं । गोदावरी तट पर स्थित होने के कारण कभी ऐसा नहीं हुआ कि इस कुंड में पानी न हो.इस साल यह कुंड पूरी तरह सूख गया । हालात यह हुए कि नासिक नगर पालिका ने टैंकर्स से पानी मंगवाकर रामकुंड को लबालब भरा, ताकि श्रद्धालुओं की भक्ति में कोई कमी न रहे। इस वक्त महाराष्ट्र का एक बड़ा इलाका पानी के लिए त्राहिमाम कर रहा है.ऐसे में तो अच्छा होता कि रामकुंड को खाली ही छोड़ दिया जाता, ताकि हजारों लोगों के पास यह मैसेज तो जरूर पहुंचता कि आज नहीं संभले तो आने वाला वक्त और भी बुरा गुजरेगा । आज डुबकी लगाने को टैंकर से पानी भरने की नौबत आ गई कल हो सकता है यह टैंकर भी न हो। मंथन का वक्त है कि हम पानी के लिए कितना गंभीर हैं।

 

इस वक्त देश के करीब 12 राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं । इनमें से दस राज्य तो ऐसे हैं जहां किसानों की हालत सबसे अधिक खराब है.आजाद भारत में ऐसा पहली बार है कि गर्मी की शुरुआत से ही एक साथ इतने राज्यों की हालत खराब है.धीरे-धीरे यह बद से बदतर ही होती जाएगी.ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जो फटकार लगाई है उसके कई मायने हैं.कोर्ट ने केंद्र की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं । केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों ने जो रवैया अपनाया है वह भी अपने आप में काफी गंभीर सवाल पैदा करता है।

बिहार, हरियाणा और गुजरात सरकार ने तो हद ही कर दी। वे सूखे के हालात पर सही तथ्य भी पेश नहीं कर सके, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि क्या आप यहां पिकनिक मनाने आते हैं। मौसम विभाग ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सामान्य से कम बारिश होने की स्थिति में इस बार स्थिति गंभीर रहेगी.सूखे से सबसे अधिक प्रभावित गरीब वर्ग और किसान है.पूरे देश से खबरें आ रही हैं.सूखे की सबसे अधिक मार महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, कर्नाटक आदि राज्यों में है.कर्नाटक में तो स्थिति यह है कि कृष्ण सागर बांध ही सूख गया है.कई राज्यों में पहली बार पानी का गंभीर संकट सामने आया है, जबकि मराठवाड़ा में तो यह स्थिति पिछले करीब पांच सालों से है.यहां पानी बंटने के कई प्वाइंट्स निर्धारित हैं, जहां लंबे समय से धारा-144 लगी हुई है. हाल ही में केंद्रीय जल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि देश भर के जलाशयों में पानी की भारी कमी रिकॉर्ड की गई है.ऐसे में गंभीर संकट की तरफ इशारा है.आंकड़ों के अनुसार देश के 91 प्रमुख जलाशयों में मार्च के अंत तक उनकी कुल क्षमता के 25 फीसदी के बराबर ही पानी बचा था. महाराष्ट्र में तो यह आंकड़ा सिर्फ 21 फीसदी ही है.अदालतें लगातार अपनी सख्त टिप्पणियों से सरकारों का ध्यान पानी की गंभीर समस्याओं की तरफ दिला रही हैं.एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सहित कई राज्यों को फटकार लगाई है, वहीं दूसरी तरफ बांबे हाईकोर्ट ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के लिए पानी की बर्बादी को आपराधिक बर्बादी माना है.वहां एक जनहित याचिका में बताया गया है कि महाराष्ट्र में तीन जगहों मुंबई, नागपुर और पुणे में आईपीएएल के बीस मैच प्रस्तावित हैं.ऐसे में पिच और मैदान की देखरेख में करीब 65 लाख लीटर पानी खर्च होगा.सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि जो राज्य लगातार तीन साल से सूखे की मार झेल रहा है वहां पानी की इस तरह की बर्बादी कहां तक जायज है. आज की जल प्रबंधन व्यवस्था से केवल उद्योगपति ही खुश हैं। सरकारें समस्या से वाकिफ होने के बावजूद कॉर्पोरेट दबाव के आगे नतमस्तक हैं। ज्यादा नहीं, अगले 10 साल बाद ही भारत व्यापक जल संकट के मुहाने पर खड़ा होगा।

 

इसमें पानी की कमी, मिट्टी का कटाव और कमी, वनों की कटाई, वायु और जल प्रदूषण ने और इजाफा ही किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का अनुमान है कि तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि सालाना गेहूं की पैदावार में 15-20% की कमी कर देगी और पानी को रसातल में पहुंचा देगी।जलसंकट को भांपते हुए कनाडा, इजराइल, जर्मनी, इटली, अमेरिका, चीन और बेल्जियम जैसे देशों की कंपनियां संग्रहण, बचाव और सीमित दोहन के लिए दीर्घकालीन योजनाएं लागू कर चुकी हैं जबकि हम इन्हीं देशों की कंपनियों को हमारे प्राकृतिक जल संसाधनों का दोहन करने का लाइसेंस जारी करते जा रहे हैं। इस सार्वभौमिक सत्य को स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही लड़ा जाएगा।

 

देश में औसत तापमान 47 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के उत्तरी इलाके बीड, नांदेड, परभणी, जालना, औरंगाबाद, नाशिक और सतारा सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। दक्षिणी कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में पानी के नाम पर दंगे भी हुए। कम बारिश ने पूरे देश में भूजल स्तर घटा दिया है। आबादी का घनत्व ज्यादा है, खेती के तरीके असंवेदनशील हैं और औद्योगीकरण बड़े स्तर पर हो रहा है। शहरीकरण व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार तथा जंगलों के नष्ट होने से सब गड्ड-मड्ड हो गया है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा हम नेपाल, उत्तराखंड, चीन, चिली सहित कई देशों में देख ही रहे हैं। दुनिया के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 2.4% होने के बावजूद भारत में विश्व की 18% जनसंख्या रहती है और जो वर्ष 2016 तक 1.26 अरब हो जाएगी और अगले 35 साल में भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। ऐसे में हर प्यासे के हलकों को तर कर पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जैविक कीटनाशक अपनाकर पानी प्रदूषण से बचाएं

Kisan help - 13 January 2019 - 8:02pm

विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी परम्परागत खेती को छोड़कर आधुनिक कही जाने वाली खेती को अपनाया। हमारे बीज- हमारी खाद- हमारे जानवर सबको छोड़ हमने अपनाये उन्नत कहे जाने वाले बीज, रसायनिक खाद और तथाकथित उन्नत नस्ल के जानवर। नतीजा, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर किसान खाद, बीज, दवाई बेचने वालों से लेकर पानी बेचने वालों और कर्जा बांटने वालों तक के चँगुल में फंस गये। यहां तक की उन्नत खेती और कर्ज के चंगुल में फँसे कई किसान आत्म हत्या करने तक मजबूर हो गये । खेती में लगने वाले लागत और होने वाला लाभ भी बड़ा सवाल है, किन्तु खेती केवल और केवल लागत और लाभ ही नहीं है हमारे समाज और बच्चों का पोषण, मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण, जैव विविधता, मिट्टी और पानी कर संरक्षण, जानवरों का अस्तित्व तथा किसानों और देश की सम्प्रभुता भी खेती से जुड़े हुए व्यापक मसले है।

हम तो परम्परागत तौर पर मिश्रित और चक्रीय खेती करते आये हैं। जिसमें जलवायु, मिट्टी की स्थिति और पानी की उपलब्धता के आधार पर बीजों का चयन होता रहा है। हमारे खेतों में हरी खाद एवं गोबर की खाद का उपयोग होता था। हमारे पूर्वज पूर्ण जानकार थे पानी वाली जगहों पर पानी वाली और कम पानी वाली जगहों पर कम पानी वाली फसल करते थे। हमारे खेतों में खेती के अलावा, फल वाले पौधे, इमारती और जलाऊ लकड़ी के पेड़, जानवरों के लिये चारा सब कुछ तो होता था । किन्तु एक फसली उन्नत और आधुनिक कही जाने वाली खेती के चक्रव्यूह में हमने अपनी परम्परागत और उन्नतशील खेती को छोड़ दिया । हमारी खेती केवल अनाज पैदा करने का साधन मात्र नहीं है बल्कि हमारी संस्कृति से जुड़ी हुयी है।

 

हमारी खेती, जल-जमीन-जंगल, जानवर, जन के सहचर्य- सहजीवन और सह-अस्तित्व की परिरचायक है। ये पॉचों एक दूसरे का पोषण करने वाले और एक दूसरे को संरक्षण देने वाले है सबका जीवन और अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है और ये भी सही है कि जन के ऊपर स्वयं के विकास के साथ-साथ बाकी सबके भी संतुलित संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी है। हमारी परम्परागत खेती पद्वति सहजीवन और सह अस्तित्व की परिचायक रही है, जबकि आधुनिक खेती संसाधनों के बेहतर प्रयोग के स्थान पर उनके अधिकतम दोहन में विश्वास करती है। अब तो अधिकतर कृषि वैज्ञानिक, जानकार आदि भी मानने लगे है कि हमारी परम्परागत फसल पद्वति ही बेहतर और टिकाऊ है। यह बात तो सही है कि आबादी-बढ़ने के कारण जमीने बँट गयी है और जोत का आकार छोटा हो गया है। किन्तु छोटी जोत का मतलब अलाभकारी खेती तो नही है। खेती का लाभ फसल के उत्पादन के साथ उसमें लगने वाली लागत और फसल पद्वति के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में ही नापा जा सकता है।

 

हमारी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से एक ओर तो हमें जमीनों उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने है और दूसरी ओर खेती में लगने वाली लागत को कम करते हुए पर्यावरण संतुलन को बनाये रखना होगा । हम सब को मिलकर "छोटी जोत अलाभदायक हैं," जैसे दुष्प्रचारों से निपटने के कारगर उपाय भी ढूंढ़ने होंगे । हम सब मिलकर वैज्ञानिक सोच, परम्परागत ज्ञान, और फसल पद्वतियों के संयोजन से लागत कम करते हुये लाभकारी और पर्यावरण हितैषी खेती को अपना कर अपनी फसल, खेत पानी आदि की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।

 

अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये हमें अपनी खेती को बेहतर बनाना होगा । रसायनिक खादों, कीटनाशकों, पानी और बीज के अनियंत्रित उपयोग को रोकते हुये एवं टिकाऊ खेती पद्वतियों को अपनाते हुए खेती की लागत कम और उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने होंगे । टिकाऊ खेती में ऐसा कुछ नही है जो हम पहले से नहीं जानते हैं- हमें रासायनिक खादों और कीटनाशकों का मोह त्याग कर जैविक खाद (हरी खाद, गोबर की खाद) जैविक कीटनाशक (गोबर, गौमूत्र, नीम, गुड़, तुलसी, खली आदि) का उपभोग बढ़ाना होगा, आवश्यकता के अनुसार कूडवार खेती अपनानी होगी । जिससे न केवल खेती की लागत में कमी आयेगी अपितु कुल उत्पादन में वृद्वि के साथ मिट्टी और पानी का सरंक्षण भी होगा । हम अपनी छोटी जोत की खेती की योजना बनाकर मिश्रित, चक्रिय, जैविक खेती अपनाकर लाभदायक और पर्यावरण हितैषी जोत में परिवर्तित कर सकते है ।

कृषि अपशिष्ट के कार्बनिक पदार्थ को जलाने से हवा जहरीली

Kisan help - 6 January 2019 - 10:21pm

सर्दियां शुरू होने के साथ ही उत्तर भारत को अकसर हर साल भारी परेशानी उठानी पड़ती है क्योंकि 20 करोड़ से ज्यादा निवासियों वाले इस क्षेत्र की हवा जहरीली हो जाती है. हवा में घुले इस जहर की वजहों की बात आती है तो अक्सर उंगलियां उन हाथों की ओर उठती हैं, जो देशभर के लोगों का पेट भरते हैं.
देश का अन्न भंडार कहलाने वाले क्षेत्र के किसानों को कृर्षि अपशिष्ट खेतों में न जलाने के लिए कहा जाता है क्योंकि इससे नयी दिल्ली, लखनऊ और इलाहाबाद जैसे बड़े शहरों की हवा दूषित हो जाती है.
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मानसून खत्म होने के बाद देश के अन्न के कटोरे के रूप में मशहूर हरियाणा और पंजाब के खेतों में बड़ी मात्रा में शेष बची पराली जलाई जाती है. इनमें लगाई जाने वाली आग इतनी व्यापक होती है कि धरती से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर मौजूद उपग्रहों तक भी इनकी जानकारी पहुंच जाती है. इस दौरान पश्चिमी हवाएं भी चलती हैं और उत्तर भारत पर धुंए का एक बड़ा गुबार सा छा जाता है. उपग्रह से ली गई तस्वीरों में यह गुबार साफ दिखाई देता है और भारत की राजधानी में सत्ता के के गलियारों में खतरे की घंटी बज जाती है. पिछली सर्दियों में भारत के प्रधान न्यायाधीश ने सख्त आदेश जारी किए थे और कार-पूलिंग करके अपने हिस्से का योगदान भी दिया था. फिर भी हवा दूषित ही रही. दिल्ली की हवा को दूषित करने में वाहनों, उद्योगों, ऊष्मीय ऊर्जा संयंत्रों और खेतों में लगाई जाने वाली आग का हाथ है. कोई नहीं जानता है कि बड़ा दोषी कौन है?किसानों की ओर उंगली उठाना आसान है लेकिन इस बात का अहसास बहुत कम है कि किसानों द्वारा कृषि अपशिष्ट जलाए जाने के पीछे कृषि का एक गहरा संकट है और यह एक स्वस्थ जीवन, हवा, पानी और जमीन के लिए जरूरी तत्वों के साथ जुड़ा हुआ है.
आज हरियाणा और पंजाब के खेतों पर बोझ इतना ज्यादा है कि वे अपनी उत्पादकता खोने लगे हैं. हरित क्रांति ने उन्हें रिणग्रस्त बंजर जमीनों के रूप में बदल दिया है.
कई साल पहले तक क्षेत्र में साल में एक या दो फसलें उगाई जाती थीं और इसके बीच की अवधि में खेतों को खाली छोड़ दिया जाता था.
खेतों को खाली छोड़े जाने की यह अवधि बेहद महत्वपूर्ण होती थी क्योंकि यह कृषि अपशिष्ट के कार्बनिक पदार्थ को खत्म होने का और ऊपरी मिट्टी से मिल जाने का मौका देती थी.
आज अधिकतर स्थानों पर चार नहीं तो कम से कम तीन फसलें तो उगाई जा ही रही हैं. एक फसल की कटाई के साथ ही किसान दूसरी फसल बोने की जल्दी होने लगती है.
ऐसे में पराली के सही इस्तेमाल का समय ही नहीं मिलता और दूसरी फसल बोने की जल्दी में किसानों के सामने इस पराली से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय उसे जला देना ही होता है, जिससे पैदा होने वाली राख जाकर मिट्टी में मिल जाती है.
यह एक दुष्चक्र है और कई दशकों से चली आ रही गड़बड़ कृषि नीतियों की वजह से किसान अपने खेतों में ज्यादा से ज्यादा फसले उगाने के लालच में फंसा हुआ है.
भारतीय कृषि अनुसंधानकर्ता देश को कम से कम अवधि में उग सकने वाली किस्में विकसित करके देते हैं और किसान बिना किसी इनकार के उसे अपनाते जाते हैं. कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोचता कि इससे मिट्टी की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है? अब तो इससे हवा भी दूषित होती जा रही है.
आप मई या जून में यदि पंजाब और हरियाणा से होकर गुजरें तो भरी गर्मी में आपको खेतों में पानी भरा हुआ दिखेगा। धरती की गहराई से निकाले गए इतने अधिक पानी में वहां धान बोया जा रहा होता है.
मानसून से कम से कम छह-आठ हफ्ते पहले किसान सहारा रेगिस्तान जैसे मौसम में धान की खेती शुरू करते हैं. धान के लिए पानी बहुत ज्यादा चाहिए, इसलिए खेतों को कृत्रिम तौर पर पानी उपलब्ध कराया जाता है.
समय से पूर्व धान बोए जाने से दो गड़बड़ियां होती हैं. एक तो पानी निकालने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. इसके कारण भूजल का स्तर गिरता जाता है.
अमेरिका में नासा के गोड्डार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के मैट रोडेल ने कहा, ‘यदि भूजल के टिकाऊ इस्तेमाल के लिए उपाय सुनिश्चित नहीं किए गए तो 11.4 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र में कृषि उत्पादन के खत्म हो जाने और पेयजल की भारी कमी जैसे नतीजे भी सामने आ सकते हैं’.

दूसरी बड़ी समस्या तब होती है जब मानसून के बाद फसल काटी जाती है. तब सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चावल बेचे जाते हैं और पीछे किसान के पास बड़ी मात्रा में पुआल बच जाता है.
दुर्भाग्यवश धान के पुआल में बड़ी मात्रा में सिलिका होता है. यह बेहद कड़ा होता है जिसके कारण पशुओं को इसे खाने में भारी दिक्कत होती है. अब किसानों को अगली फसल बोने की जल्दी होती है इसलिए उनके पास कृषि अपशिष्ट को जलाने के अलावा कोई विकल्प बचता ही नहीं.
पुआल से कार्बनिक कंपोस्ट बनाने का इंतजार करना या इसे एकत्र करके कृषि अपशिष्ट से उपयोगी चीजें बनाने वाले स्थानों पर भेजने में लगने वाला समय और धन दोनों ही ज्यादा हैं. ऐसे में किसानों को अपशिष्टों को जला देना ही एकमात्र उपाय दिखाई पड़ता हैं.
मिट्टी की ऊपरी सतह के लिए कार्बनिक पदार्थ बेहद महत्वपूर्ण हैं लेकिन उत्तर पश्चिम भारत में यह मात्रा तेजी से कम हो रही है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह मिट्टी जल्दी ही बंजर हो सकती है.
पंजाब के पर्यावरण की मौजूदा स्थिति के बारे में स्थानीय सरकार द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया, ‘राज्य में पैदा होने वाले 80 फीसदी पुआल (1.84 करोड़ टन) और लगभग 50 फीसदी पराली (85 लाख टन) हर साल खेतों में जला दी जाती है.
इससे जमीन की उर्वरता पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही इससे निकलने वाली मीथेन, कार्बन डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों और सल्फर डाइ ऑक्साइड गैसों और कणों के कारण वायु प्रदूषण भी होता है. इनके कारण सांस, त्वचा और आंखों से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं’.
रिपोर्ट के अनुसार, ‘जरूरत से ज्यादा खेती भी जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन डाइ ऑक्साइड, मेथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है’.
जब किसानों के पास व्यापक स्वदेशी जानकारी है तो फिर वे ऐसे नुकसानदायक काम क्यों कर रहे हैं? दुर्भाग्यवश इनका दोष सरकार की कृषि-आर्थिकी की नीतियों पर जाता है.
वायु प्रदूषण की पूरी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री की फौरी तौर पर लाई गई ‘सम-विषम योजना’ या किसानों को कृषि अपशिष्ट न जलाने का आदेश सुनाया जाना और दंडित करने का प्रावधान काम नहीं करने वाला.
दिल्ली और उत्तर भारत के लोगों का दम घुटने से बचाने के लिए कृषि अर्थव्यवस्था की संरचना को एक नए समग्र ढंग से निर्धारित करना होगा

अजवाइन की खेती

Kisan help - 2 January 2019 - 7:52pm

यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। इसके बीजों में 2.5-4% तक वाष्पशील तेल पाया जाता है।अजवाइन(celery seed )खजीज तत्वों का अच्छा स्रोत हैं। इसमें 8.9% नमी, 15.4% प्रोटीन, 18.1% वसा, 11.9% रेशा, 38.6% कार्बोहाइड्रेट, 7.1% खनिज पदार्थ, 1.42% कैल्शियम एवं 0.30% फास्फोरस होता हैं। प्रति 100 ग्राम अजवाइन से 14. 6मी.ग्रा. लोहा तथा 379 केलोरिज मिलती हैं।

 

औषधीय गुण
अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं। अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द, चर्म रोग, दमा आदि रोगों की औषधी बनाने के काम में लिया जाता हैं। अजवाइन के सत को दंतमंजन एवं टूथपेस्ट, शल्य क्रिया में प्रतिरक्षक के तोर पर प्रयोग किया जाता हैं। इसके अलावा यह बिस्कुट फल, सब्जी संरक्षण में काम आता हैं।

 

जलवायु
उत्तरी अमेरिका, मिस्त्र ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य्प्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान के कुछ हिसों में अजवाइन की व्यावसायिक खेती की जाती हैं। अजवाइन की बुवाई के समय मौसम शुष्क होना चाहिए। अत्यधिक गर्म एवं ठंडा मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होता हैं। अजवाइन पाले को कुछ स्तर तक सहन कर सकती हैं।

 

राजस्थान राज्य में इसकी खेती 15483 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती हैं जिससे 5450 टन उत्पादन एवं 352 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं (वर्ष 2009-10 के अनुसार)। इसकी खेती मुख्यतः चित्तौडगढ, उदयपुर, झालावाड़, राजसमंद, भीलवाड़ा एवं कोटा में की जाती हैं।

अजवाइन कम लागत की मसाला फसल हैं तथा इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए यदि उन्नत तकनीकी से खेती की जाये तो इसके उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती हैं। इसके लिए ध्यान देने योग्य बिंदुओं का विवरण इस प्रकार से हैं:-

उन्नत किस्में
लाम सलेक्शन-1
135 से 145 दिन में पक कर तैयार होने वाली इस किस्म की औसत उपज 8-9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती हैं।

लाम सलेक्शन-2
इसके पौधे झाड़ीदार होते हैं इसकी औसत उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

आर.ए. 1-80
यह किस्म 170-180 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। दाने बारीक़ परन्तु अधिक सुगंधित होते हैं इसमें 10-11 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती हैं। इस किस्म पर सफेद चूर्णिल आसिता रोग का प्रकोप अधिक रहता हैं।

भूमि
अजवाइन एक रबी की मसाला फसल हैं। इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं। सामान्यतः बलुई दोमट मिटटी जिसका पि.एच. मान 6.5 से 8.2 तक है, में अजवाइन सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं। जहां भूमि में नमी कम हो वहां सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक हैं।

 
खेती की तैयारी
खेत तैयार करने के लिए मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें तथा इसके बाद 2 जुताई देशी हल से कर खेत को भली-भांति तैयार करें। अजवाइन का बीज बारीक़ होता हैं। अतः खेत की मिट्टी को अच्छी तरह भरभूरा होने तक जुताई करें।

खाद एवं उर्वरक
अजवाइन की भरपूर पैदावार लेने के लिए 15-20 दिन पूर्व 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह मिलाए। उर्वरक के रूप में इस फसल को 20 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस एवं 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देवें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व खेत में डाल देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के लगभग 25-30 दिन बाद खड़ी फसल में देवें।

बीज दर एवं बुवाई
अजवाइन की बुवाई का उचित समय सितम्बर से नवम्बर होता है। इसे छिड़काव या क़तर विधि से बोया जाता है। एक हेक्टेयर के लिए 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिड़काव विधि के लिए बीजों को इसकी बीज दर से आठ से दस गुना बारीक छनि हुई मिट्टी के साथ मिलाकर बुवाई करे इससे बीज दर सही रखने में मदद मिलती है। कतारों में बुवाई करना ज्यादा उपयुक्त है। इस विधि में कतार से कतार की दुरी 30-40 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दुरी 15-25 से.मी. रखें। इसमें बीजों का अंकुरण 10-15 दिनों में पूर्ण होता है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई
अजवाइन की फसल काफी हद तक सूखा सहन कर सकती है। इसका सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में उत्पादन किया जा सकता है। सामान्यतया अजवाइन के लिए 2-5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। जब पौधे 15-20 से.मी. तक बड़े हो जाये तब पौधों की छंटाई करके पौधे से पौधे की दुरी में पर्याप्त अंतर रखें। फसल में जल निकासी की भी उचित व्यवस्था करे ताकि पौधों को उचित बढ़वार के लिए पर्याप्त स्थान एवं वातावरण मिल सके।

फसल कटाई एवं उपज
कटाई की उपयुक्त अवस्था में फसल पीली पड़ जाती है तथा दाने सुखकर भूरे रंग के हो जाते है। अजवाइन की फसल लगभग 140-150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। कटाई पश्चात फसल को खलिहान में सुखावें तथा बाद में गहाई और औसाई की जाय। साफ बीजों को 5-6 दिन सूखा कर बोरों में भर कर भंडारण करे।

अजवाइन का फसल में प्रमुख रोग
छाछया  रोग

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है। इसके नियंत्रण के लिए  घुलनशील गंधक 2 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर इसे 15 दिन बाद दोहरायें।

झुलसा रोग
इस रोग के लक्षण में पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे बनते है एवं अधिक प्रकोप में पत्तियां झुलस जाती है। इस रोग के रोकथाम हेतु मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करें। जरुरत होने पर दूबर छिड़काव करें।

उपज
सामन्यतः एक हेक्टेयर में अजवाइन की उपज 10-12 क्विंटल तक की पैदावार प्राप्त होती है। अजवाइन बहुउपयोगी होने के साथ विदेशों में विक्रय कर विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत है।

अगर किसान भाई अजवाइन की खेती संबंधित मुख्य बिंदुओं को ध्यान में रखकर खेती करें तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। साथ ही वह कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते है।

organic farming: अजवाइनजैविक खेती: औषधिफ़सलagricare: जैविक कृषि सुरक्षा

तंबाकू की खेती

Kisan help - 29 December 2018 - 5:13pm

किसानों के लिए नकदी फसलें कम लागत व कम समय में ज्यादा लाभ देने वाली मानी जाती हैं. नकदी फसलों की प्रोसेसिंग व मार्केटिंग के बारे में जानकारी ले कर किसान अच्छा फायदा ले सकते हैं. इन्हीं नकदी फसलों में तंबाकू की खेती खास है. तंबाकू की खेती न केवल कम समय में की जाती है, बल्कि इस के मामले में किसानों को मार्केटिंग के लिए इधरउधर भटकना नहीं पड़ता है. तंबाकू की फसल की कटाई व प्रोसेसिंग के बाद किसान के खेत से ही फसल की बिक्री आसानी से हो जाती है. भारत में तंबाकू की कई किस्में उगाई जाती हैं. किन किस्मों को उगाना है, यह उस के अलगअलग इस्तेमाल पर निर्भर करता है. घाटे की खेती से उबरने के लिए तंबाकू की खेती एक अच्छा तरीका साबित हो सकती है

बोने की विधि

तंबाकू की पौध तैयार के लिए बीज की नर्सरी क्षेत्र में बुवाई विभिन्न प्रकार से की जाती है कुछ कृषक बीजों को जल के साथ मिलाकर फव्वारे से नर्सरी क्षेत्र में फैला देते हैं कुछ किसान बीज उर्वरक के साथ मिलाकर छिड़काव विधि से बो देते हैं कुछ वीडियो को राखिया रेत के साथ मिलाकर क्षेत्रवाद बुवाई करते हैं आदि प्रकार से करते हैं। तम्बाकू के बीचड़े की रोपाई से पूर्व खेत को अच्छी तरह जुताई करें, ताकि उसमें ढेले न रहे। खेत में पाटा चला कर समतल कर दें। दस टन प्रति एकड़ कम्पोष्ट या गोबर, खल्ली 1112 किलो, रोपनी पूर्व यूरिया 80 किलो, कैल्सियम 86 किलो, फॉस्फेट 150 किलो, पोटाश 45 किलो प्रति एकड़ जोत में मिला दें।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

तम्बाकू के लिए गहरी दोमट अथवा मिश्रित लाल व कछारी मिट्टी उपयुक्त रहती है। तम्बाकू भूमि में से उपजाऊ तत्वों को बहुत जल्दी खींच लेती है, अतः पोटाश, फ़ॉस्फ़ोरिक ऐसिड और लोहांश के रूप में खाद की आवश्यकता पड़ती है।

बीज की जानकारी

तंबाकू की 1 हेक्टेयर फसल की रोपाई के लिए लगभग 100 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में तंबाकू के 50 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।

उर्वरक की जानकारी

खाद एवं उर्वरक 1 हेक्टेयर फसल की 2 वर्ग मीटर नर्सरी तैयार करने के लगभग 100 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद दवाई के 1 माह पूर्व तैयारी में मिला देनी चाहिए 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली हुक्का तंबाकू की नर्सरी के लिए नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा में 120 80 व 40 किग्रा है सिगरेट तंबाकू के 1 हेक्टेयर पौधा नर्सरी नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश की संतुलित मात्रा 100 -60 व 30 किग्रा देना चाहिए।

जलवायु और सिंचाई

इसके लिए साधारणतः 50 से 100 सेटीमीटर वर्षा ही चाहिए। इससे अधिक वर्षा वाले भागों में इसकी खेती नहीं की जा सकती। पत्तियों के पकने के समय वर्षा हो जाने से इसकी किस्म बिगड़ जाती है।

सिंचाई व खरपतवार

तंबाकू की रोपाई के बाद हर 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए. फसल कटाई के 15 दिनों पहले खेत की सिंचाई रोक दी जाती है. फसल की अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के लिए पहली निराई 10-15 दिनों बाद करनी चाहिए. फसल में घासफूस के नियंत्रण के लिए जरूरत के हिसाब से 3 बार निराई करना जरूरी होता है.

बीमारियां व कीट

तंबाकू की फसल में मोजैक बीमारी का ज्यादा प्रकोप देखा गया है. इस के अलावा शुरुआती अवस्था में आग्र पतन, चित्ती, पडकुंचन रोगों का प्रकोप पाया जाता है. इस के अलावा तंबाकू की सूंड़ी, इल्ली, गिडार, तना छेदक, माहू, कटुआ व दीमक कीटों का प्रकोप देखा गया है. ये सभी कीट व रोग पौधों को पूरी तरह खत्म कर देते हैं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बेनिल 10 फीसदी धूल का छिड़काव फसल में कीट का प्रकोप दिखाने के समय ही कर देना चाहिए. इस के अलावा क्लोर पायरीफास 20 ईसी या प्रोफेनोफास 50 ईसी का छिड़काव करना चाहिए. बीमारी की रोकथाम के लिए कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब, थीरम, मेटालेक्जिल, डीनोकेप दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. तंबाकू की फसल के लिए ज्यादा पाला व ज्यादा बारिश भी नुकसानदेह होती है. ज्यादा पाले व बारिश की दशा में फसल के सूखने व बरबाद होने के आसार बढ़ जाते हैं. ऐसे में ज्यादा बारिश व पाले वाली जगहों पर तंबाकू की खेती करने से बचना चाहिए.

फुनगों की तोड़ाई

 तंबाकू की फसल में अच्छी गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने के लिए उस के फुनगों की तोड़ाई करना जरूरी होता है. जब फसल 60 दिनों की हो जाए, तो हर 10 दिनों के बाद 3 बार फुनगों की तोड़ाई की जानी चाहिए. यह कोशिश करें कि पौधों में 9 से 10 पत्ते ही आने पाएं.

पौधों की कटाई

 खाने वाले तंबाकू की फसल 120 दिनों में, बीड़ी वाले तंबाकू की फसल 140 से 150 दिनों में और सिगार व चुरुट वाले तंबाकू की फसल 90 से 100 दिनों में कटाई के लायक हो जाती है. पौधों की पत्तियां जब हरी हों तभी उन की कटाई कर देनी चाहिए और कटाई के बाद 3 दिनों तक पौधों को खेत में ही छोड़ देना चाहिए. जब पत्तियां पीली पड़ जाएं तो उन को खेत से उठा कर सही जगह पर दोबारा फैला कर सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए. इस दौरान खाने वाले तंबाकू की नसों पर चीरा लगाना जरूरी होता है. सूखने के दौरान तंबाकू में नमी व सफेदी जितनी ज्यादा आती है उतना ही अच्छा गुण, रंग, स्वाद व गंध पैदा होती है. ऐसे में तंबाकू की पलटाई समय से करते रहना चाहिए. इस से किसानों को तंबाकू का अच्छा मूल्य मिल जाता?है. घर पर करीब 1 हफ्ते तक सुखाने के बाद पत्तियों में चीरा लगा कर अलगअलग किया जाता है. उस के बाद कुछ दिनों के लिए पत्तियों को पालीथीन से ढक कर सुगंध पैदा करने के लिए छोड़ दिया जाता?है. जब उन मेंअच्छी सुगंध उठने लगती है, तो इस की गठिया बांध कर इस में पानी का छिड़काव कर के छटका जाता है. जब इस में सफेदी आने लगे तो यह मान लिया जाता है कि तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी स्थिति में हो गई है.

मार्केटिंग व लाभ

 तंबाकू किसान ओमप्रकाश का कहना है कि ज्यादातर मामलों में खेत में खड़ी फसल ही बिक जाती है, जिसे व्यापारी करीब 25000 रुपए प्रति बीघे की दर से लेते हैं. तंबाकू की 1 एकड़ फसल के लिए करीब 15000 रुपए की लागत आती है, जबकि 1 एकड़ से फसल अच्छी होने की दशा में 4 महीने में करीब 1 लाख रुपए की आमदनी होती है. इस प्रकार लागत मूल्य को निकालने के बाद शुद्ध आमदनी करीब 85 हजार रुपए प्रति एकड़ हो जाती है. भारतीय तंबाकू की ज्यादा मांग बाहरी देशों में होने के कारण अच्छा मूल्य मिलता है. भारत द्वारा उत्पादित तंबाकू अमेरिका, रूस, फ्रांस, अफ्रीका, ब्रिटेन, सिंगापुर, बेल्जियम, हांगकांग, चीन, नीदरलैंड व जापान वगैरह देशों को भेजा जाता है. ऐसे में किसान विदेशी निर्यातक व्यापारियों से संपर्क कर के अपनी उपज का अच्छा दाम पा सकते हैं.

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organic farming: तंबाकू