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कहां खो गई हम किसानों की स्वाधीनता

Kisan help - 14 August 2018 - 8:00pm

वैश्विक तापवृद्धि, जलवायु परिवर्तन, कुदरती आपदाओं में इजाफा और बढ़ती लागत के चलते खेती पहले से ही घाटे का सौदा है। लेकिन, अब मुक्त व्यापार नीतियों के तहत सस्ते कृषि उत्पादों का बढ़ता आयात किसानों को गहरे संकट में डाल रहा है। इससे न केवल बढ़ती आबादी के अनुरूप खाद्यान्न उत्पादन में बढोतरी की रफ्तार धीमी पड़ गई है। बल्कि, सरकारी कोशिशों के बावजूद किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत नहीं मिल पा रही है। इसका सीधा असर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता और किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। गौरतलब है कि देश 70 वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। जिस उदारीकरण की नीतियों को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान माना गया, वही अब किसानों को कंगाली के बाड़े में धकेल रही है। यह समस्या इसलिए भी गंभीर होती जा रही है। क्योंकि, भूमंडलीकरण के दौर में सरकार ने कृषि व्यापार का उदारीकरण तो कर दिया। लेकिन, भारतीय किसानों को वह सुविधाएं नहीं मिलीं कि वह विश्व बाजार में अपनी उपज बेच सकें।

दूसरी ओर, विकसित देशों की सरकारें और कृषि जन्य कारोबारी कंपनियां हर प्रकार के तिकड़म अपनाकर देश के विशाल बाजार में अपनी पैठ बढाती जा रही हैं। बंपर फसल के बावजूद किसानों को उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलने की एक बड़ी वजह सस्ता आयात भी है। भारत में खाद्य तेल और दालों का आयात तो लंबे अरसे से हो रहा है । लेकिन , अब गेहूं, मक्का और गैर बासमती चावल का भी आयात होने लगा है। पिछले तीन वर्षों में इन अनाजों का आयात 110 गुना बढ गया जो कि चिंता का कारण बनता जा रहा है। उदाहरण के लिए, 2014-15 में जहां 134 करोड रुपए का गेहूं, मक्का और गैर बासमती चावल का आयात किया गया था । वहीं, तीन साल बाद 2016-17 में यह आंकडा बढ़कर 9009 करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान फलों और सब्जियों का आयात भी तेजी से बढ़ा है। अब तो बागवानी उपजों का भी आयात होने लगा है। उदाहरण के लिए श्रीलंका से हुए मुक्त व्यापार समझौते की आड़ में वहां की सस्ती स्थानीय और वियतनाम से आयातित काली मिर्च भारत में धडल्ले से आ रही है, जिससे भारतीय कालीमिर्च के किसानों को लागत निकालना कठिन हो गया है। समस्या यह है कि एक ओर कृषि उपजों का आयात बढ़ रहा है तो दूसरी ओर देश से होने वाले कृषिगत निर्यात में कमी आने लगी है। उदाहरण के लिए 2014-15 में 1.31 लाख करोड़ रुपए का निर्यात हुआ तो 2015-16 में 1.08 लाख करोड़ रुपए रह गया। कृषि उपज के बढ़ते आयात की एक बड़ी वजह यह है कि हमारे यहां सरकारें जितनी चिंता महंगाई की करती हैं उसका दसवां हिस्सा भी किसानों के आमदनी की नहीं करतीं। यही कारण है कि बाजार की कीमतों में तनिक सी बढ़ोतरी होते ही सरकार के माथे पर बल पडऩे लगता है और वह तुरंत आयात शुल्क में कटौती कर देती है। इस सस्ते आयात का सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। इसे गेहूं के उदाहरण से समझा जा सकता है। 2015-16 में गेहूं उत्पादन के बंपर अग्रिम अनुमान को देखते हुए सरकार ने गेहूं खरीद का लक्ष्य तीन करोड़ टन रखा। लेकिन, वास्तविक खरीद 230 लाख टन ही हो पाई। ऐसे में बाजार में गेहूं की कीमतें चढऩी शुरू हो गर्इं। इससे चिंतित सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क 25 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया।

इसके बाद भी कीमतों में बढ़ौत्तरी नहीं थमी तो दिसंबर 2016 में सरकार ने गेहूं पर लगने वाले आयात शुल्क को पूरी तरह हटा लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि आयातक एजेंसियां और दक्षिण भारतीय आटा मिलें गेहूं का आयात करने लगीं और मार्च 2017 तक 35 लाख टन गेहूं आयात के अनुबंध हो गए। घरेलू किसानों के बढ़ते दबाव और 2017 में गेहूं की बढिय़ा फसल को देखते हुए सरकार ने मार्च 2017 में गेहूं पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगाया। इसके बावजूद गेहूं का आयात जारी है। गेहूं की कहानी दालों के साथ दुहराई गई। दालों की महंगाई से परेशान सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भरपूर बढ़ौत्तरी की। इसका परिणाम यह हुआ कि 2016-17 में दालों का उत्पादन 260 लाख टन हो गया। लेकिन, इस दौरान 57 लाख टन आयात के कारण घरेलू बाजार में दालों की प्रचुरता हो गई, जिससे किसानों को एमएसपी से भी कम कीमत पर दाल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने के लिए दूरगामी उपाय कर रही है। पिछले तीन वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए शुरू की गई योजनाएं इसका प्रमाण हैं, जैसे राष्ट्रीय कृषि बाजार, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, यूरिया पर नीम का लेपन, जैविक खेती और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। लेकिन, विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के अनुरूप जिस ढंग से कृषि उपजों का आयात बढ़ रहा है उससे न केवल खेती-किसानी बदहाली की ओर जा रही है बल्कि, देश की खाद्य संप्रभुता भी खतरे में पड़ जाने की आशंका व्यक्तकी जाने लगी है। आखिर भारत, पनामा, कुवैत जैसा छोटा-मोटा देश तो है नहीं, जो आयातित खाद्यान्न के बल अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर ले। स्पष्ट है कि अगर हम सस्ते कृषि उपज के बढ़ते आयात पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हुए तो सस्ता आयात हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।

हमे बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया इन रासायनिक खादों ने :गिरिजा कान्त सिंह

Kisan help - 11 July 2018 - 7:44pm

हमे बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया इन रासायनिक खादों ने ऐसे शव्दों को न्यूट्रीवर्ड कम्पनी के डायरेक्टर  श्री गिरिजा कान्त सिंह जी ने ।उन्होंने फसल में लगातार बदने बाले उर्वरकों के प्रति चिन्ता जाहिर की उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों का  प्रयोग वर्ष प्रति वर्ष बढ़ता जा रहा है। उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशको का चलन हरित क्रांति में किया गया।हमारे प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन जी ने रासानिक खादों और संकर प्रजाति के बीजों की वकालत की। जिसकी  कीमत अव हमारे देश के किसान चुका रहे हैं ,उन्होंने साथ ही यूरिया के अंधाधुंध प्रयोग पर चिन्ता जाहिर की साथ ही उन्होंने यूरिया तथा अन्य रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से लेकर उससे होने वाली समस्या के बारे में बताया l

उन्होंने कहा कि किसानों द्वारा इस्तेमाल किए गए नाइट्रोजन से पौधे मात्र 30 फीसदी एफ यूरिया का उपयोग करते हैं। फसल की माँग से अधिक उपयोग में लाया गया नाइट्रोजन वाष्पीकरण और निष्टालन के जरिये खत्म हो जाता है। नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग जलवायु परिवर्तन और भूजल प्रदूषण को बढ़ावा देता है। यूरिया जमीन में रिस जाता है तथा नाइट्रोजन से मिलकर नाईट्रासोमाईन बनाता है जिससे दूषित पानी को पीने से कैंसर, रेड ब्लड कणों का कम होना और रसौलियाँ बनती हैं।उन्होंने डॉ आर के सिंह के एक कार्यक्रम का जिक्र भी किया जिसमें रासायनिक उर्वरकों के इतिहास के बारे में बताया गया था रासायनिक कृषि विनाश का नया आगाज

DAP खाद रॉक फास्फेट के रूप में मँगवाई जाती है जिसका शोधन कर इसमें से पी फास्फोरस प्राप्त किया जाता है। उन्होंने बताया कि शोधन के दौरान इसमें है, heavy element जैसे कोवाल्ट, कैडमियम और यूरेनियम आदि रह जाते हैं जिनके प्रयोग से मिट्टी तथा पानी दूषित होता है। मिट्टी की उर्वरता स्थिति में लगातार गिरावट हरित क्रांति की दूसरी पीढ़ी की सबसे गम्भीर समस्याओं में एक मानी जाती है। मिट्टी की उर्वरता स्थिति में गिरावट मुख्य रूप से सघन फसल प्रणालियों द्वारा पोषक तत्वों को हटाये जाने से आयी है जो पिछले कई दशकों के दौरान उर्वरकों एवं खादों के जरिये इतनी अधिक हो गयी है कि उनको फिर से भर पाना मुश्किल है। किसान अधिकतर नाइट्रोजन युक्त उर्वरक (ज्यादातर यूरिया) या नाइट्रोजन युक्त और मिश्रित जटिल उर्वक (ज्यादातर यूरिया या डीएपी) का उपयोग करते हैं तथा पोटाश और अन्य अभाव वाले पोषकों के उपयोग को नजर अन्दाज कर देते हैं। दूसरी तरफ, बहुपोषक तत्व की कमियाँ भी अधिकतर मिट्टियों में पहले ही उभर आई हैं तथा विस्तारित हो चुकी हैं। विभिन्न परियोजनाओं के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में किए गए मिट्टी यानि मृदा विश्लेषण से कम से कम 6 पोषक तत्वों-नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी), पोटाश (के) जिंक (जेडएन) और बोरॉन (बी) की व्यापक कमी प्रदर्शित हुई।

उत्तर-पश्चिमी भारत के चावल-गेहूँ उगाये जाने वाले क्षेत्रों में किए गये कुछ नैदानिक सर्वे से पता लगा कि किसान उपज स्तर को बनाये रखने के लिए, जिन्हें पहले कम उर्वरक उपयोग के जरिए भी हासिल कर लिया जाता था, अक्सर उचित दरों से ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग करते हैं। वैज्ञानिक निर्देशों के बावजूद नाइट्रोजन उर्वरकों में सबसे आम यूरिया का अन्धाधुन्ध उपयोग किया जाता है। यूरिया के अत्यधिक उपयोग का मिट्टी, फसल की गुणवत्ता और कुल पारिस्थितिकी प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एक फसल में यूरिया का प्रयोग कर अगली फसल के लिये इसकी जरूरत नहीं रहती लेकिन किसान गेहूँ की फसल को खाद देने के बाद इसे धान में भी प्रयोग करते हैं जबकि इसकी जरूरत नहीं होती। किसानों द्वारा साल में ज्यादा फसलें लेने के कारण फसलों की घनत्व 177 हो गई है। उर्वरता को बढ़ाने के लिए रूढ़ी की खाद, soil health program, फसल विविधिकरण तथा organic factor को बढ़ाना चाहिए। गेहूँ तथा धान को काटने के बाद बची हुई नाड को जलाने की बजाए मिट्टी में ही मिला देना चाहिए। जिसके लिए सरकार द्वारा किसानों सबसीडी दी जाती है। इससे कम खर्च में ज्यादा मुनाफा पाया जा सकता है।

यूरिया का असन्तुलित उपयोग नाइट्रोजन की कुशलता को घटा देता है जिससे उत्पादन की लागत में वृद्धि हो जाती है और शुद्ध मुनाफे में कमी आती है। अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग फसल के रसीलेपन को बढ़ा देता है जिससे पौधे बीमारियों और कीट संक्रमण के शिकार हो सकते हैं। यह मिट्टी के पोषक तत्वों, जिनका उपयोग नहीं किया गया है या पर्याप्त रूप से उपयोग नहीं किया गया है, के खनन को बढ़ाता है जिससे मृदा की उर्वरता में गिरावट आती है। ऐसी मिट्टियों को अधिकतम उपज देने के लिए भविष्य में अधिक उर्वरकों की जरूरत होगी। नाइट्रोजन एवं अन्य पोषक तत्वों की कुशलता, लाभप्रदत्ता और पर्यावरण सुरक्षा को बढ़ाने के लिए यूरिया के उपयोग को युक्तिसंगत बनाने की जरूरत है।

उन्होंने रासायनिक घटकों के साथ जैविक सूक्ष्म तत्वों का प्रयोग करने की वकालत की उन्होंने बताया कि उर्वरक यूरिया उपयोग का सन्तुलन न केवल फास्फोरस और पोटास के साथ किया जाना चाहिए बल्कि द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ भी किया जाना चाहिए न्यूट्रीवर्ड कम्पनी का साड़ा वीर,साड़ा वीर 4G, साड़ा वीर फर्राटा, साड़ा वीर स्प्रे का नियमित प्रयोग से फसल का उत्तम उत्पादन के साथ मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों में वर्द्धि होती है।

उन्होंने किसानों को मिट्टी परिक्षण के बाद ही अनुशासित उर्वरकों के प्रयोग की बात कही  साथ ही फसल चक्र का जिक्र और उसकी खूबियों के बारे में बताया । किसानों को सल्फर सूक्ष्म पोषण परीक्षण के लिए जोर देना चाहिए क्योंकि (सल्फर और सूक्ष्म पोषकों के बगैर) केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश अब सन्तुलित उर्वरक नुस्खा नहीं है। फसलों में फलियों तथा दालों का समावेश उर्वरक (यूरिया) की जरूरत में 25 से 50% तक की कमी ला सकता है। दाल के पौधे नाइट्रोजन को जमीन में रिसने से रोकते हैं फसल प्रणाली एवं सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर फलियों को अन्तवर्ती फसल हरित खाद, चारा, फसल या अल्पकालिक अनाज फसल के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। उचित फसल चक्र अपनाकर भी मृदा का उपजाऊपन बढ़ाया जा सकता है। फसल चक्र में खाद्यान्न फसलों के साथ दलहनी फसलों को भी उगाना चाहिये। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती है। साथ ही समृद्ध एवं टिकाऊ खेती के लिए मृदा में जीवांश पदार्थ की मात्रा को भी बढ़ाती हैं। भूमि के उपजाऊपन को बनाये रखने में जैविक कृषि विधियों का विशेष योगदान है। इसके अलावा खेत की तैयारी, फसल चक्र, कीट व रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव, समय से बुवाई, सस्य, भौतिक व यांत्रिक विधियों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण किया जा सकता है। मृदा के उपजाऊपन को बढ़ाने में एकीकृत कीट/व्याधि प्रबंध की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इसमें कीटनाशकों एवं शाकनाशियों के साथ हानिकारक जीवों व खरपतवारों को नियन्त्रित करने के लिए बायोएजेंट, बायोेपेस्टीसाइड, कृषि प्रणाली में बदलाव जैसे - शून्य जुताई व कम जुताई को अपनाकर भी मृदा की उर्वरा शक्ति में सुधार किया जा सकता है।इसी श्रखला में न्यूट्रीवर्ड कम्पनी का साड़ावीर, साड़ावीर 4G,  साड़ावीर फर्राटा,  साड़ावीर स्प्रे का नियमित प्रयोग से फसल का उत्तम उत्पादन के साथ मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों में वर्द्धि होती है।

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गन्ना भुगतान में देरी के लिए सरकार के साथ रासायनिक कीटनाशक भी जिम्मेदार

Kisan help - 9 July 2018 - 2:26pm

निजी हित के लिए बहुत सी कम्पनियाँ किसानों को गुमराह करतीं हैं।देश में किसानों की आर्थिक स्थिति से लेकर स्वास्थ्य समस्यायें बढ़ती जा रही हैं।सरकार और बैज्ञानिकों को अपनी जिम्मेदारी से किसानों के लिए काम करना चाहिए और साथ में किसानों को भी अपनी जागरूपता बढ़ानी होगी।

देश में किसानों की हालत गंभीर है।प्रतिवर्ष हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं।कारण किसानों पर कर्ज का दवाव।किसानों की सबसे बड़ी समस्या उनकी फसल का उत्पादन है किसान हजारों मुसीबत झेलते हुए फसल का उत्पादन करता है जिसमें अधिक तापमान, कम बारिश ,अधिक बारिश, बाढ़, तूफान आदि की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उसके बाद उसे जो उत्पादन मिलता है उसकी बिक्री बाजार की विकराल समस्या का सामना करना पड़ता है।

बाजार मिलने के बाद उसके उत्पादन मूल्य मिलना और समय से उस मूल्य का भुगतान यह सबसे बड़ी समस्या होती हैं। गन्ना किसानों के साथ भी किसानों की जानी मानी पुरानी समस्याओं का प्रकोप रहता है।चीनी मिलों की बेरुखी, सरकार का सौतेला व्यवहार के बाद भुगतान नहीँ। इस साल पिछली बार की तरह सरकार ने तुरन्त भुगतान की घोषणा की नतीजा शून्य बल्कि उससे भी बुरा। लेकिन इस तरह की समस्या क्यों आती हैं?

 मैंने इस बात पर क्रमबद्ध रूप से विचार किया और अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय निकाला कि सरकार के बाद सबसे बड़ी समस्या फसल में कीटनाशकों का मिलना है।विदेशों में हमारी चीनी की बिक्री नही हो पा रही है चीनी ही नही हमारे देश से विदेशों में जाने वाला खुशबु दार चावल जिसकी विदेशों में बहुत माँग रहती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कमी आयी है।क्योंकि हमारे उत्पादन में कीटनाशकों की मात्रा अधिक मिली ।विशेष रूप से खाद्यान्न उत्पादन में यह समस्या बड़ी है ,चीनी की माँग भी चीनी में खतरनाक कीटनाशक पाए जाने के कारण कमी आयी है जिसके कारण चीनी मिलों ने किसानों के भुगतान रोक दिये।

मुझे याद है कि किसानो के का एक कार्यक्रम में मैने कोराजन के खिलाफ बोला तो बहुत से किसान मुझसे असंतुष्ट हुये लेकिन अभी कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के चीनी एवं गन्ना आयुक्त ने भी इस बात को माना कि कोराजन का अत्यधिक प्रयोग खतरनाक है। 2012 में 2016 में पाकिस्तान जैसे देश ने हमारा टमाटर लेने से मना कर दिया हवाला कीटनाशक की मात्रा दिया नतीजा हमारे यहाँ किसानों को टमाटर सड़क पर फेंकना पड़ा। टमाटर ही नही प्याज,लहसुन,आलू ,व अन्य बहुत सी सब्जियों को सड़कों पर हम किसानों के द्वारा फेंक कर प्रदर्शन किये गए। यह स्थिति प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है जिसके लिएहम किसानों को अपने तरीके,उर्वरक और कीटनाशकों की बदलना होगा सरकार को भी नीतियाँ बदलनी होगी।कृषि आय की दुगना करने की घोषणा से कुछ नहीं होगा।अब कृषि क्षेत्र को उद्योग का दर्जा देना होगा। किसान हैल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं जाने माने जैविक प्रचारक डॉ आर के सिंह के किसान बचाओ कार्यक्रम में विचार

जिरेनियम की खेती

Kisan help - 3 July 2018 - 12:23pm

कम पानी और जंगली जानवरों से परेशान परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए जिरेनियम की खेती राहत देने वाली साबित हो सकती है। जिरेनियम कम पानी में आसानी से हो जाता है और इसे जंगली जानवरों से भी कोई नुकसान नहीं है। इसके साथ ही नए तरीके की खेती ‘जिरेनियम’ से उन्हें परंपरागत फसलों की अपेक्षा ज्यादा फायदा भी मिल सकता है। खासकर पहाड़ का मौसम इसकी खेती के लिए बेहद अनुकूल है। यह छोटी जोतों में भी हो जाती है। जिरेनियम पौधे की पत्तियों और तने से सुगंधित तेल निकलता है।

 

साधारण नाम जिरेनियम, रोज जिरेनियम वानस्पतिक नाम पेलार्गोनियम ग्रेवियोलेंस उन्नत किस्म सिम-पवन, बोरबन, सिमैप बयों जी-17।

प्रमुख रासायनिक घटक जिरेनियाल व एल-सिट्रोनेलाले।

 

जलवायु

जलवायु उपोष्ण, ठंड एवं शुष्क जलवायु। 25-30 डिग्री से तापक्रम एवं आर्द्रता 60% से कम अच्छी बढ़वार के लिये उपयुक्त।

 

लाभ

पहाड़ के ढलान वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त - कम पानी वाले क्षेत्रों में आसानी से खेती - बाजार में अत्यधिक मांग एवं उचित दाम - छोटी जोतों के लिए उपयुक्त यहां होता है उपयोग जिरेनियम के तेल में गुलाब के तेल जैसी खुशबू आती है। इसका प्रयोग साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, उच्च स्तरीय इत्र व तंबाकू के साथ ऐरोमाथिरेपी में किया जाता है।

 

भूमि

दोमट भूमि, पी.एच.-5.5-8.0, जीवांश पदार्थ की अधिकता एवं समुचित जल निकास की व्यवस्था वाली मृदा उपयुक्त रहती है। प्रवर्धन 12-15 सेमी. लम्बी, रोग मुक्त 3-4 गांठों वाली शाकीय कटिंग से पौधें तैयार किये जाते है।

 

खेत की तैयारी

पौध रोपण एवं भूमि खेत की अच्छी जुताई करने के पश्चात् उसमें सड़ी हुई 10-15 टन गोबर की खाद मिलाकर सुविधाजनक आकार की क्यारियों में रोपाई 50ग50 सेमी. की दूरी पर करनी चाहिए। जिरेनियम उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में नवम्बर से जनवरी के मध्य लगाते है।

 

खाद एवं उर्वरक

60 किग्रा. फास्फोरस, 40 किग्रा. पोटाश प्रति हे. के हिसाब से अन्तिम जुताई के समय मिला देना चाहिए। नत्रजन को तीन बार 50 किग्रा. प्रति हे. की दर से 20-25 दिन के अन्तराल पर डालना चाहिए। एक हे. में कुल 150 किग्रा. नत्रजन पड़ती है।

 

सिंचाई

फसल को 5-6 सिंचाई की आवष्कता पड़ती है।

कटाई

100-120 दिन की फसल होने के बाद कटाई करते है। दूसरी कटाई पहली कटाई के 60-90 दिनों के बाद करते है। ऊपर से 20-30 सेमी. तक केवल हरी शाखाओं को काटना चाहिए। कटाई के बाद कटे हुए पौधों पर ताँबायुक्त फफूँदी नाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

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धान की फसल में खरपतवार नियंत्रण के कारगर उपाय

Kisan help - 19 June 2018 - 11:55am

धान की फसल में पाये जाने वाले प्रमुख खरपतवार सावां घास, सावां, टोडी बट्टा या गुरही, रागीया झिंगरी, मोथा, जंगली धान या करघा, केबघास, बंदरा- बंदरी, दूब (एकदलीय घास कुल के), गारखमुडी, विलजा, अगिया, जलकुम्भी, कैना, कनकी, हजार दाना और जंगली जूट हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए निम्रलिखित उपाय अपनावें:-
1. जहां खेत में मिट्टी को लेव बनाकर और पानी भरकर धान को रोपा या बाया जाता है, वहां जो खरपतवार भूमि तैयार करने से पहले उग आते हैं, वे लेव बनाते समय जड़ से उखाड़कर कीचड में दब-सड़ जाते हैं। इसके बाद मिट्टी को 5 से. मी. या अधिक पानी से भरा रखने पर नए व पुराने खरपतवार कम पनप पाते हैं।
2. बीज छिटकवां धान जिसमें बियासी नहीं की जाती हो, वहां बुआई के तुरन्त बाद या नई जमीन में या सूखी भूमि में बोनी के बाद, पानी बरसने के तुरन्त बाद ब्यूटाक्लोर 2.5 लीटर/ हेक्टेयर सक्रिय तत्व का छिड़काव 500 लीटर पानी में घोलकर करने से लगभग 20 से 25 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं। खड़ी फसल में दो बार 20-25 दिनों और 40-45 दिनों की अवस्था पर निंदाई करें।
3. बीज छिटकवा धान जहां बियासी की जाती हो वहां बियासी करने के बाद 7 दिनों के अन्दर निंदाई और चलाई किया जाना चाहिये। दूसरी निंदाई 25-30 दिनों पर करना चाहिये। बियासी के लिए समय पर पानी उपलब्ध होने पर निंदाई करना चाहिये। बुआई के 40-45 दिनो बाद बियासी नहीं करना चाहिये
4. धान के खेत में खरपतवार नियंत्रण हेतु रसायनिक विधियां अधिक कारगर सिद्ध हुई हंै, जिनका विवरण सारणी में दिया गया है।
धान के खेत में नोमिनो गोल्ड खरपतवारनाशक सिर्फ एक ही छिड़काव में सभी प्रमुख खरपतवारों (डिला मोथा, छतरी वाला मोथा, फिम्बीस्टाइलिस) घुई (मोथा के विभिन्न प्रकार पान पत्ता, पानी घास, पीले फूल वाली बूंटी मिर्च बूंटी चार पत्ती, सफेद फूस वाली बूंटी (चौड़ी पत्ती)और घास (स्वांकी , स्वांक और कनकी) को नियंत्रित करता है। इस खरपतवारनाशक को खरपतवार निकलने के बाद 10-25 दिन के बीच में प्रयोग कर सकते हैं। यह खरपतवारनाशक सीधे बोये गये धान, धान की नर्सरी और रोपित धान, सभी में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण करता है। यह खरपतवारनाशक धान की फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित है एवं धान को कोई आघात नहीं पहुंचाता है। एक हेक्टेयर में ‘नोमिनो गोल्डÓ खरपतवारनाशक दवा की 200 से 300 मिली लीटर को 450 से 500 लीटर पानी में मिलाएं और खेत में से पानी निकालकर खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करें ताकि खरपतवार पर दवा का प्रयोग हो सके। खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव करने के 2-3 दिन बाद दुबारा खेत में पानी भर दें एवं कम से कम एक सप्ताह तक 3-5 से.मी. पानी खड़ा रहने दें। यह खरपतवारनाशक दवा छिड़काव के 6 घण्टे में ही अपना काम शुरू कर देता है। 6 घण्टे बाद बरसात आने पर भी खरपतवार नियंत्रण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता इस खरपतवारनाशी को अन्य पौध रक्षक रसायनों के साथ मिश्रण के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है और इसका धान पर कोई प्रतिकू ल प्रभाव नहीं पड़ता है।

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पशुओं के लिए मह्त्वपूर्ण होते हैं खनिज लवण

Kisan help - 26 May 2018 - 7:03am
image vatanary: 

पशुओं के लिए खनिज लवण प्रजनन में  अतिमहत्वपूर्ण स्थान हैं। शरीर में इनकी कमी से नाना प्रकार के रोग एवं समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। इनकी कमी से पशुओं का प्रजनन तंत्र भी प्रभावित होता है, जिससे पशुओं में प्रजनन संबंधित विकार पैदा हो जाते है, जैसे पशु का बार-बार मद में अनाना, अधिक आयु हो जाने के बाद भी मद में नहीं आना, ब्याने के बाइ के मद में नहीं आना या देर से आना तथा मद में आने के बाद का नहीं रूकना इत्याइि तरह के उत्पन्न हो जाते हैं। इन विकारों के लिये कारण उत्तरदायी है, जिसमें एक खनित लवण भी हैं। 

पशुओं के लिए खनिज लवण के विस्तृत जानकारी से पहले यह बताना आवश्यक है, कि खनिज क्या है ।

किसी भी वस्तु के जलने पर जो राख बचती है, उसे भस्म या खनित कहतें हैं। यह बहुत ही थोड़ी मात्रा में प्रत्येक प्रकार के चारे-दाने तथा शरीर के प्रायः सभी अंगों मे पाये जाते है। प्रकृति में लगभग ४० प्रकार के खनिज जीव-जन्तुओं के शरीर में पाये जाते है, लेकिन इसमें से कुछ ही अत्यन्त उपयोगी है। जिनकी आवश्यकता पशु के आहार में होती है। शरीर के आवश्यकतानुसार खनिजों को दो भागों में बाटते है। एक तो पशुओं के लिए खनिज लवण जो अधिक मात्रा में पशु के लिये आवश्सक है, जिनकी मात्रा को ग्राम में या प्रतिशत में व्यक्त करते है इनको प्रमुख खनित कहते है, जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम , सल्फर,, मैग्निशियम तथा क्लोरीन दूसरे पशुओं के लिए खनिज लवण वे  जो शरीर हेतु बहुत सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते है, जिसको पी.पी.पी. में व्यक्त करते है, ऐसे खनिजों को सूक्ष्म या विरल खनिज कहते है, जैसे लोहा, जिंक, कोबाल्ट, कापर, आयोडिीन, मैगनीज, मोलीब्डेनम, वेमियम, लोरिन, सेलेनियम, निकल, सिलिकान, टिन एवं वेनाडियम। यघपि दूसरे सूक्ष्म खनिज जैसे एल्यूमीनियम, आर्सेनिक , बेरियम, बोरान, ग्रोमीन, कैडमियम भी शरीर के マतकों में पाये गये है, परन्तु शरीर में इसकी भूमिका के बारे में अभी तक जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी हें।

इस प्रकार कैल्शियम, फास्फाकरस, पोटेशियम, सोडिीयम, सल्फर, मैग्नीशियम, क्लोरीन, लोहा तॉबा, कोबाल्ट, मैगनिज, जिंक एवं आयोडीन आदि  अति आवश्यक पशुओं के लिए खनिज लवण है, जो जीवन एवं स्वास्थ्य रक्षा हेतु आवश्यक है। शरीर में पशुओं के लिए खनिज लवण के सामान्य कार्य की बात किया जाय तो कैल्शियम एवं फास्फोरस दॉत हड्डियों के बनने में आवश्यक है। दूधारू गायों के रक्त में कैथ्ल्श्शयम की कमी से दुग्ध ज्वर हो जाता है। सोडियम, पोटैशियम एवं क्लोरीन शरीर के द्रवों में परिसारक दाब को ठीक बनाये रखते है तथा उनमें अन्य गुणों का सन्तुलन स्थापित करते है। रक्त में पोटैशियम, कैल्शियम तथा सोडियम का समुचित अनपात हदय की गति तथा अन्य चिकनी मांसपेशियों को उत्तेजित करने एवं उनमें संकुचन की व्यिा सम्पन्न करने के लिए आवश्यक है। लौह लवण लाल रक्त कणों में हीमोग्लोबिन बनाने में आवश्यक होता है, जिसके कारण रक्त में आक्सीजन लेने की शक्ति पैदा होती है। अन्य पशुओं के लिए खनिज लवण या तो शरीर के कुछ आवश्यक भाग बनते हे या एन्जाइम पद्वति के आवश्यक तत्व बनाते है। इसके अतिरिक्त इनके कुछ विशेष कार्य भी होते है।

प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने वाले पशुओं के लिए खनिज लवण की बात की जाए तो ये मुख्यतः कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, तॉबा, कोबाल्ल्ट, मैगनित आयोडीन एवं जिंक है। इन जैविक तत्वों की कमी से पशुओं में मदहीनता अथवा आर आर मद में आना एवं गर्भ धारण न करने की समस्यायें आती है। आहार में कैल्शियम की कमी के कारण अडांणु का निषेचन कठिन होता है, तथा गर्भाशय पीला तथा अव्शिशील हो जाता है। पशुओं के आहार में फास्फोरस के कमी से पशुओं में अण्डोतत्सर्ग कम होता है, तथा पशु का गर्भपात हो जाता है। अन्य सूक्ष्म खनिज लवण भी पशुओं में अण्डोत्पादन, शुवणुत्पादन, निषेचन, श्रारण   के विकास एवं बच्चा पैदा होने तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभातें है। मुर्गियों में अण्डा उत्पादन हेतु कैल्शियम सहित अन्य खनिज लवण अति आवश्यक है। इनके आहार में कैल्शियम के कमी से अच्छी गुणवत्ता वाले अण्डे का उत्पादन प्रभावित होता है।

चारे में प्रोटीन, कार्बोहार्इड्रेट, मिनरल्स तथा विटामिनों की छमता बढ़ाने तथा कमी पूरी करने के लिए डॉ की सलाह अनुसार  टॉनिक और दवा नियमित रूप से दें | टॉनिक और दवा नियमित रूप से देने पर उत्पादकता में काम से काम 25% की बढ़ोतरी होती है और पशुओं रोग प्रतिरोधी छमता बढ़ती है और चारे पर भी खर्च काम आता है |

अतः पशुपालक भाईयों को चाहिए कि इस तरह की समस्याओं को दूर रखने के लिए पशुओं को संतुलित आहार दें, अर्थात पशुओं के दाने चारे में शर्करा या कार्बोहाइडेट, प्रोटीन,, वसा, खनिज लवण तथा विटामिनों का सन्तुलित मात्रा में होना नितान्त आवश्यक होता है। इन पोषक तत्व के असन्तुलित होने के कारण ही कुपोषण जन्य रोग पैदा होते है। पशु के आहार में सुखे चारे तथा हरे चारे अवश्यक होना चाहिए। केवन हरा चारा या केवल सूखा चारा नहीं देना चाहिए, कम से कम दो – तिहार्द सूखा चारा तथा एक तिहाई हरा चारा होना चाहिए। जहॉ तक दाना की बात है तो कोई एक प्रकार का दाना या खली नही देना चाहिऐ बल्कि इनका मिश्रण होना चाहिए। यदि एक कुन्टल दाना तैयार करना है तो २०-३० किग्रा खली, ३०-४० किग्रा चोकर, १५-२५ किग्रा, दलहनी फसलों के उपजात, १५-२५ किग्रा अदलहनी फसलों के उत्पाद, २ किग्रा खड़िया एवं १ किग्रा नमक लेकर भली भाति मिश्रित कर लेना चाहिए। प्रौढ़ पशुओं को निर्वाह हेतु ऐसे मिश्रित दाने की एक व्यिा मा.ा एवं अन्य कार्यो जैसे प्रजनन एवं गर्भ हेतु १-१.५० किग्रा एवं दूध उत्पादन हेतु ढ़ाई से तीन किग्रा दूध पर १ किग्रा दाना निर्वाहक आहार के अतिरिक्त देना चाहिए। इस प्रकार से दिये गये आहार से पशुओं में खनिज लवणों की प्रति अधिकाशंत हो जाती है, परन्तु फिर भी इनमें से कुछ सूक्ष्म पशुओं के लिए खनिज लवण की कमी हो सकती है जिसके लिए ग्रोवेल का पशुओं के लिए खनिज लवण  उपलब्ध है,जो की काफी लाभदायक और त्वरित परिणाम देनेवाला है,  जिसको ५० से १०० ग्राम प्रतिदिन प्रति प्रौढ़ पशु को देना चाहिए। पशुओं के आहार में ख्खिलाये जाने वाले विभिन्न चारो दानों, जैसे हड्डियों एवं मांस के चूर्ण में १५ से ६४ प्रतिशत, दो दालिय सूखी घासों में ७ से ११ प्रतिशत, खली एवं भूसी में ५-७ प्रतिशत, भूसा में ४-५ प्रतिशत, आनाज में १.५-३.० प्रतिशत एवं हरे चारे तथा साइलेज में १ से ३ प्रतिशत खनिज लवण पायें जाते हैं।

आधुनिकता की भेंट चढ़े किसानों के मित्र पक्षी

Kisan help - 16 May 2018 - 3:51pm

किसानों के मित्र समझे जाने वाले मित्र पक्षियों की कई प्रजातियां काफी समय से दिखाई नहीं दे रहीं हैं। किसान मित्र पक्षियों का धीरे-धीरे गायब होने के पीछे बहुत से कारणों में एक बड़ी वजह किसानों द्वारा कृषि में परंपरागत तकनीक छोड़ देने, मशीनीकरण व कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल को माना जा रहा है।
गाँव-गाँव में मोबाइल फोन के टावरों से निकलने वाली तरंगों से भी मित्र पक्षियों तथा कीटों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। कौन से हैं किसानों के मित्र किसान मित्र पक्षियों में मोर, तीतर, बटेर, कौआ, शिकरा, बाज, काली चिड़ी और गिद्ध आदि हैं, जो दिन-प्रतिदिन लुप्त होते जा रहे हैं। ये पक्षी खेतों में बड़ी संख्या में कीटों को मारकर खाते हैं। आज से एक दशक पहले तक ये पक्षी काफी अधिक संख्या में थे लेकिन अब इनमें कुछ पक्षियों के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
सबसे ज्यादा असर तो खेतऔर घरों में आमतौर पर दिखने वाली गौरया चिड़ी पर पड़ा है। खेतों में तीतर व बटेर जैसे पक्षी दीमक को खत्म करने में सहायक थे, क्योंकि उनका मनपंसद खाना दीमक ही है। इनके प्रजनन का माह अप्रैल, मई है और ये पक्षी आम तौर पर गेहूं के खेत में अंडे देते है। आज किसान गेहूँ कम्बाइन से काटते हैं और बचे हुए भाग को आग लगा देते हंै। इससे तीतर, बटेर के अंडे, बच्चें आग की भेंट चढ़ जाते है। इसी कारण इनकी संख्या में कमी आ रही है।
नरमा, कपास के खेतों में दिन-प्रतिदिन कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा छिड़काव हो रहा है। जिससे बड़ी संख्या में तीतर-बटेरों की हर साल मौत हो जाती है। कमोबेस यही स्थिति मांसाहारी पक्षियों बाज, शिकरा, गिद्ध और कौवों की भी है।

खूबसूरत मोर भी हुए लुप्तप्राय गाँव का सबसे खूबसूरत पक्षी और वर्षा की पूर्व सूचना देने वाले मोर भी अब लुप्त होते जा रहे है। ये पक्षी किसानों को सांप जैसे खतरनाक जंतुओं से भयमुक्त रखता है और साथ ही पक्षी शिकार कर खेतों से चूहे मारकर खाने में मशहूर है। वर्तमान में जहरीली दवाओं की वजह से मोरों की संख्या बहुत कम हो गई है।

मुर्दाखोर गिद्ध भी गायब हैं भारत मे कभी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थी, लेकिन अब बिरले ही कहीं दिखाई देते हैं। संरक्षण कार्यकर्ताओं का मानना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में अविश्वसनीय रूप से 97 प्रतिशत की कमी आई है। गिद्धों की इस कमी का एक कारण बताया जा रहा है: पशुओं को दर्दनाशक के रूप में दी जा रही दवा डायक्लोफ़ेनाक, और दूसरा, दूध निकालने लिए के लगातार दिए जा रहे ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इन दवाओं के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो ये रसायन उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। मुर्दाखोर होने की वजह से गिद्ध पर्यावरण को साफ-सुथरा रखते है और सड़े हुए माँस से होने वाली अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता कर प्राकृतिक संतुलन बिठाते है।

गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है। इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, एक गिद्ध जोड़ा साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देता है। कीटनाशकों के प्रयोग से मरे अधिकांश पक्षी कीटनाशकों का प्रयोग लगातार बढऩे से अन्य कीटों के साथ-साथ चूहे भी मर जाते हैं और इन मरे हुए चूहों को खाने से ये पक्षी भी मर जाते हैं। इसी प्रकार कौवे तथा गिद्ध भी जहर युक्त मरे जानवरों को खाने से मर रहे हैं। खेतों में सुंडी जैसे कीटों को मारकर खाने वाली काली चिडिया व अन्य किस्म की चिडियों पर भी कीटनाशकों का कहर बरपा है। अब ये पक्षी कभी-कभार ही दिखाई देते हैं।

वृक्षों का कटना भी है कारण खेतों से पक्षियों के गायब होने का एक बड़ा कारण है किसानों द्वारा वृक्षों का काटना। किसानों द्वारा किसी जमाने में खेतों में वृक्षों के नीचे पक्षियों के लिए पानी व खाने का प्रबंध किया जाता था, परंतु अब ठीक इसके विपरीत हो रहा है, जिससे अब पक्षियों का रूख खेतों की तरफ नहीं हो रहा है।

मृदा संरक्षण

Kisan help - 10 May 2018 - 9:50am
मृदा संरक्षण (Soil Conservation)

मिट्टी एक अमूल्य प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर संपूर्ण प्राणि जगत निर्भर है । भारत जैसे कृषि प्रधान देश में; जहाँ मृदा अपरदन की गंभीर समस्या है, मृदा संरक्षण एक अनिवार्य एवं अत्याज्य कार्य है। मृदा संरक्षण एक प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत न केवल मृदा की गुणवत्ता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है, बल्कि उसमें सुधार की भी कोशिश की जाती है । मृदा संरक्षण की दो विधियाँ हैं -

क) जैवीय विधि ब) यांत्रिक विधि ।

(क) फसल संबंधी -

1. फसल चक्रल - अपरदन को कम करने वाली फसलों का अन्य के साथ चक्रीकरण कर अपरदन को रोका जा सकता है । इससे मृदा की उर्वरता भी बढ़ती है ।
2. पट्टीदार खेती - यह जल-प्रवाह के वेग को कम कर अपरदन को रोकती है ।
3. सीढ़ीनुमा खेती - इससे ढ़ाल में कमी लाकर अपरदन को रोका जाता है । इससे पर्वतीय भूमि को खेती के उपयोग में लाया जाता है ।
4. मल्विंग पद्धति - खेती में फसल अवशेष की 10-15 से.मी. पतली परत बिछाकर अपरदन तथा वाष्पीकरण को रोका जा सकता है । इस पद्धति से रबी की फसल में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकती है।
5. रक्षक मेखला - खेतों के किनारे पवन की दिशा में समकोण पर पंक्तियों में वृक्ष तथा झाड़ी लगाकर पवन द्वारा होने वाले अपरदन को रोका जा सकता है ।
6. खादों का प्रयोग - गोबर की खाद, सनई अथवा ढँचा की हरी खाद एवं अन्य जीवांश खादों के प्रयोग से भू-क्षरण में कमी आती है ।

(ख) वन रोपण संबंधी पद्धति -

वन मृदा अपरदन को रोकने में काफी सहायक होते हैं । इसके तहत दो कार्य आते हैं -
प्रथम, नवीन क्षेत्रों में वनों का विकास करना, जिससे मिट्टी की उर्वरता एवं गठन बढ़ती है। इससे वर्षा जल एवं वायु से होने वाले अपरदन में कमी आती है ।
द्वितीय, जहाँ वनों का अत्यधिक विदोहन, अत्यधिक पशुचारण एवं सतह ढलवा हो, वहाँ नये वन लगाना ।

(ग) यांत्रिकी पद्धति

यह पद्धति अपेक्षाकृत महंगी है पर प्रभावकारी भी ।
1/ कंटूर जोत पद्धति - इसमें ढ़ाल वाली दिशा के समकोण दिशा में खेतों को जोता जाता है, ताकि ढ़ालों से बहने वाला जल मृदा को न काट सके ।
2/ वेदिका का निर्माण कर अत्यधिक ढ़ाल वाले स्थान पर अपरदन को रोकना ।
3/ अवनालिका नियंत्रण - (क) अपवाह जल रोककर (ख) वनस्पति आवरण में वृद्धि कर तथा (ग) अपवाह के लिए नये रास्ते बनाकर ।
4/ ढ़ालों पर अवरोध खड़ा कर ।
मृदा संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास
भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारंभ के साथ ही इस दिशा में अनेक कदम उठाए जाने लगे थे । सुदूर संवेदन तकनीकी की मदद से समस्याग्रस्त क्षेत्र की पहचान की जा रही है । 
विभिन्न क्षेत्रों में वानिकीकरण की राष्ट्रव्यापी शुरूआत की गई है । इसमें सामाजिक वानिकी भी शामिल है ।
राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर परियोजना, मरू विकास कार्यक्रम तथा मरूथल वृक्षारोपण अनुसंधान केन्द्र आदि की शुरूआत की गई है।
शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता से झूम खेती नियंत्रण कार्यक्रम पूर्वोत्तर राज्यों, आन्ध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में शुरू किया गया है । इसके अलावा भी मृदा संरक्षण हेतु प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

मिट्टी की भौतिक तथा रासायनिक विशेषताओं में अपने ही स्थान पर परिवर्तन या हृस होना ही मृदा-प्रदूषण है । इसमें मिट्टी में गुणात्त्मक हृस होता है, जिसे मृदा अवनयन Soil Degradation कहा जाता है। इसके निम्न रूप हैं-

1 ऊसरीकरण

सामान्य शब्दों में जिस मिट्टी में नमक के कणों की परत मिट्टी की ऊपरी सतह पर मिलती है उसे ऊसर कहा जाता है । ऊसर भूमि में क्षारीयता (Alkolimity)  अधिक होती है । भारत में ऊसरीकरण मुख्य रूप से दो कारणों से हो रहा है:-
अ. प्रथम कारण प्राकृतिक है, जिसमें भूमिगत जल स्तर ऊँचा होता है । उच्च भूमिगत जल स्तर वाले भागों में अधिक ताप के कारण वाष्पीकरण होता है, जिसके फलस्वरूप नमक के कण केशिका क्रिया Capillary Action)  द्वारा ऊपर आकर जमा हो जाते हैं । इस प्रकार के ऊसर के टुकड़े समूचे उत्तरी मैदान के पट्टियों में मिलते हैं । दूसरा क्षेत्र गुजरात है, जहाँ अधिक तापमान के कारण वाष्पीकरण अधिक होता है । इससे नमक ऊपरी सतह पर आ जाता है । तीसरा क्षेत्र तटवर्ती राज्यों का है, जहाँ समुद्र का नमकीन जल भूमिगत जलभरों ;ळतवनदक ।Ground Aquifers)में प्रविष्ट हो जाता है । इसका नमक पुनः केशिक क्रिया द्वारा धरातल पर जमा हो जाता है ।
ब. लवणीकरण का दूसरा कारण मानवीय अर्थात् नहरों द्वारा सिंचाई है । नहरों के जल के रिसाव से या नहरों के कटने से, भूमिगत जल स्तर ऊँचा हो जाता है, जिससे केशिका क्रिया द्वारा नमक के कण धरातल पर जमा हो जाते हैं । भारत में नहरों द्वारा सिंचित सभी क्षेत्रों में मिट्टी में लवणीकरण की मात्रा में वृद्धि हुई है ।

नियंत्रण के उपाय -

सन् 1876 में उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त की सरकार ने रेह आयोग ;(Reh Commission)  की स्थापना की थी जिसने ऊसरीकरण का कारण बड़ी नहरों के निर्माण को बताया था । 1972 में यह विषय सिंचाई आयोग द्वारा पुनः उठाया गया, जिसने दो कदम सुझाये थे -
अ. उचित जल-प्रवाह व्यवस्था तथा
ब. नहरों द्वारा जल रिसाव पर नियंत्रण ।
सन् 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुमान से भारत में जलप्लावित तथा लवणीकृत क्षेत्र 1.3 करोड़ हेक्टेयर था । सन् 1988 में योजना आयोग द्वारा एक कार्यदल नियुक्त किया गया, जिसका उद्देश्य आठवीं योजनावधि में ऐसी भूमि के बारे में प्रस्ताव तैयार करना था । इस कार्यदल ने प्रस्तुत किया कि भारत में जलप्लावन तथा लवणीकरण से प्रभावित क्षेत्र प्रतिवर्ष 9 लाख हेक्टेयर की दर से बढ़ रहा है । 1991 में कुल प्रभावित क्षेत्र 20.3 लाख हेक्टेयर था ।

2- बंजर भूमि

जिस भूमि का कोई आर्थिक प्रयोग न हो, उसे बंजर भूमि कहा जाता है । इसके निम्न कारण होते हैं -
1. दोषपूर्ण भूमि एवं जल प्रबंधन ।
2. निर्वनीकरण ।
3. अति पशुचारण, तथा
4. अति कृषि ।

3- नम भूमि

नम भूमि स्थलीय तथा जलीय परिस्थितिक तंत्र के मध्य वह संक्रमणीय पेटी होती है जहाँ या तो भूमिगत जलस्तर अत्यधिक ऊँचा या सतह के पास होता है या भूमि पूर्णकालिक या अल्पकालिक रूप से जलमग्न होती है । उदाहरण के लिए भारत का पश्चिमी एवं पूर्वी तटवर्ती भाग; जहाँ लैगून, झील, डेल्टा तथा तट रेखा के सहारे नम-भूमि क्षेत्र है । इसके अतिरिक्त देश के आतंरिक भागों में झीलों के पास का भाग तथा बाढ़ के दौरान जलप्लावित भाग नम-भूमि के अन्तर्गत आता है ।
नम-भूमि दो प्रकार के होते हैं -
अ. मार्श - वैसे दलदली भाग, जो ग्रीष्मकाल में जलावृत नहीं होते, तथा
ब. स्वाम्प - ये सालों भर (ग्रीष्म काल में भी) जलावृत रहते हैं ।

4- ज्वारीय दलदल

उपरोक्त पेटी के मध्य कुछ निम्न भागों में ज्वार का जल इकठ्ठा हो जाता है, जिसे ज्वारीय दलदल कहा जाता है ।
भारत में नम-भूमि का कुल क्षेत्रफल लगभग 40 लाख हेक्टेयर है ।
भारत में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के निम्न नम-भूमियों का निर्धारण किया गया है -
1. वूलर झील एवं हरीके वैरेज
2. चिलका झील
3. केवलादेव राष्ट्र घाना पक्षी उद्यान, भरतपुर
4. लोकटक झील, मणिपुर, तथा 
5. सांभर झील, राजस्थान नम-भूमि यद्यपि एक प्रकार की अनुपयोगी भूमि मानी जाती है, किन्तु इसका अध्ययन विकास के क्षेत्र में निम्न महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है -
1. बाढ़ नियंत्रण
2. जल की गुणात्त्मकता का नियमन

3. प्रदूषण को कम करना, तथा
4. जलीय - कृषि तथा जलीय जन्तु प्रजनन क्षेत्र के लिए संभाव्य स्थान ।
भारत सरकार ने संरक्षण एवं प्रबन्धन हेतु 21 नम-भूमि क्षेत्रों की पहचान की है ।

5- अम्लीकरण

वन प्रदेशों की मिट्टी को पत्तियों द्वारा प्राकृतिक रूप से अम्ल मिलता रहता है । इसके अतिरिक्त मानवीय क्रियाओं द्वारा भी मिट्टी में अम्ल की मात्रा में वृद्धि होती रहती है । 
भारत में अम्लीय वर्षा की सूचना कई स्थानों से प्राप्त हाती है । उदाहरण के लिए कानपुर औद्योगिक क्षेत्र के कारण अम्लीय वर्षण के कारण कानपुर क्षेत्र में अम्ल की मात्रा अधिक हो गई, फलस्वरूप उस क्षेत्र की मिट्टी अनुपजाऊ हो गई ।  नियंत्रण के उपाय -
अम्लीय वर्षा से बचने के लिए वायु-प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण करना होगा ।

6- रिले क्रापिंग

एक ही खेत में वर्ष भर लगातार तीन या उससे अधिक फसलें लेते रहना ही ‘रिले क्रापिंग’ है। रबी की फसल को सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है । सिंचाई के समय मिट्टी के रासायनिक तत्त्व घुलकर मिट्टी की परिच्छेदिका ;वपस च्तवपिसमद्धके निचले संस्तर में जमा हो जाते हैं । गर्मी में खेत के खाली रहने की स्थिति में कृषक खेतों की जुताई कर देता है, जिससे नीचे जमा तत्त्व केशिका क्रिया (Capillry Action) ऊपर आ जाते हैं । इससे मिट्टी में उर्वरा शक्ति पुनः आ जाती है । मिट्टी के रासायनिक तत्त्वों के इस प्राकृतिक चक्रण कद्वारो मृदा-चक्र ;ैवपस ब्लबसमद्ध कहा जाता है । मनुष्य रिले - क्रापिंग द्वारा इस चक्र में बाधा उत्पन्न करता है । वह गर्मी में खेतों को अवकाश नहीं देता । अपितु उन पर जायद की फसलें पैदा करता है जिसके लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है । गर्मी में भी खेतों की सिंचाई होते रहने के कारण मिट्टी के उर्वरक तत्त्व वर्ष भर रिसाव द्वारा नीचे जाते रहते हैं । उनको ऊपर आने का अवसर नहीं मिलता । फलस्वरूप मिट्टी अनुपजाऊ हो जाती है ।

7- अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग

ये मृदा को प्रदूषित करते हैं । इन्हीं समस्याओं से बचने के लिए हरी खाद तथा जैव उर्वरक पर अधिक बल दिया जा रहा है ।

8- नगरीय तथा औद्योगिक कचरे का विसर्जन

इनसे भी मृदा में प्रदूषण बढ़ता है ।

 

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डायनासोर के समान इंसान भी विलुप्त हो जाएंगे : अमित बमोरिया

Kisan help - 3 May 2018 - 5:18pm

खेती में कीटनाशकों का भयावह उपयोग, अधिक पैदावारी के लिए यूरिया, डीएपी की अधिकता, नरवाई की आग, सबकुछ जीवों के लिए प्रतिकूल है। पक्षियों में इसका असर दिखाई देने लगा है। वह दिन दूर नहीं, जब इंसान भी डायनासोर के समान विलुप्त हो जाएंगे। मोती की खेती करने वाले अमित बमोरिया ने किसान कल्याण सम्मेलन में बुधवार को बात कहीं।  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  माननीय  शिवराज सिंह चौहान  जी के हांथो से पुरुस्कार पाने वाले  मड़ई के पास कामती रंगपुर के ने भविष्य की महामारी की आशंका व्यक्त की , बमोरिया ने कहा खेती में कीटनाशकों का भयावह उपयोग, अधिक पैदावारी के लिए यूरिया, डीएपी की अधिकता, सबकुछ जीवों के लिए प्रतिकूल है   आज किसान आर्थिक रूप से परेशानी  झेल  रहा है. मैंने एक एकड़ जमीन में आठ लाख रुपए कमाए हैं। सरकार कृषि को लाभ का धंधा बनाना चाहती है।

 हमेशा मीडिया  की सुर्खियों  में रहने वाले उन्नत किसान अमित बमोरिया जी ने मोती ,मछली ,बतख , कड़कनाथ मुर्गा  और तालाब के किनारे फल और फूलो  की खेती करके 8 लाख रु कमाए , अमित जी ने बताया  उपरोक्त सभी कार्य एक दुसरे के पूरक है . तालाब के किनारे रेड  लेडी  पपीता (  साल में 70-100  किलो  फलन) , सुगर फ़्री स्टीविआ  आदि की खेती से आय अर्जित  की है ..वही मोती पालन देखने और सीखने देश विदेश से लोग आते रहते है , 
मोती और मछली पालन में तालाब की जरूत होती है जिससे  जमीन में  जल संरक्षण होने से पानी की समस्या से निपटा  जा सकता हे और बहुउदेशीय खेती करके लाखो की कमाई भी की जा सकती है , अमित जी के फार्म पर काला आम , काला टमाटर  , काला  अमरुद  ,सुगर फ्री आम , बारहमासी  आम , मैदानी  सेव , पिस्ता, तेजपत्ता   आदि कई पौधे लगाए है जो आकर्षण  का केंद्र होंगे .

किसानों की आय दोगुना कर किसानों को मजबूत करना चाह रही है। मैंने कामती फार्महाउस में मोती बनाने का कार्य, कड़कनाथ और बटेर पालन शुरू किया। इससे अधिक लाभ मिला। कोई भी किसान आकर देख सकता है।

अमित बामोरिया अब तक सैकड़ो किसानों को मोती पालन की ट्रेनिंग दे चके हैं , मोती पालन के साथ वह सीप भस्म,मोती भस्म ,मछली पालन,बत्तख पालन,मुर्गी पालन की भी ट्रेनिंग देते हैं । 

कृषि वैज्ञानिक डॉ. विकास जैन ने किसानों को बीज की जानकारी दी। बीज तीन के हैं। बीमारी, कीट व फर्टिलिटी बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और लागत कम लगेगी। जनपद अध्यक्ष मंजू जगदीश अहिरवार, कृषि स्थाई समिति अध्यक्ष फूलवती कुशवाह, भगवान सिंह पटेल, राघवेंद्र पटेल, विधायक प्रतिनिधि चुन्नीलाल पटेल, सहायक संचालक गोविंद मीना व शैलेंद्र राठौर, एसएडीओ आरपी अटारे, बीटीएम आत्मा सुनील बर्डे व किसान मौजूद थे। 

 

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सिट्रोनेला (जावा घास) की खेती

Kisan help - 2 May 2018 - 12:04pm

सुगंधित पौधों के वर्ग में मुख्य रूप से जो पौधे हैं, वे हैं – लेमन ग्रास, सिट्रोनेला, तुलसी, जिरेनियम पामारोजा/रोशाग्रास। नींबू घास की दो प्रजातियाँ – सी. फ्लेसुसोयम – भारत में पाई जाती है, जबकि सी. स्टेरिट्स – दक्षिणी पूर्वी देशों में पाई जाती है।

प्रकृति ने हमें सुगन्धित पौधों का अनमोल खजाना प्रदान किया है जिनकी विधिवत खेती और तेल के आसवन से आज हमारे देश में हजारों किसान लाभान्वित हो रहे हैं। इन सुगन्धित पौधों से निकाले गए सुवासित तेल विभिन्न प्रकार की सुगन्धियों के बनाने के अतिरिक्त एरोमाथिरैपी में बहुतायत से प्रयोग किये जाते हैं। लखनऊ स्थित सीएसआईआर के अग्रणी संस्थान केन्द्रीय औषधीय एवं सगन्ध पौधा संस्थान (सीमैप) द्वारा अनेकों ऐसी फसलों के साथ-साथ नींबू घास अथवा (लेमनग्रास) और रोशाघास (पामारोजा) तथा सिट्रोनेला (जावा घास) की उन्नत खेती हेतु कृषि प्रौद्योगिकी व अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास किया गया है। 

जावा घास को जावा सिट्रोनेला के नाम से जाना जाता है, यह बहुवर्षीय सगन्ध पौधा है। इसका सगन्ध तेल सुगन्ध प्रसाधन सामग्री के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है। इसका तेल जिरेनियॉल, सिट्रोनेलाल एवं जिरेनियॉल एसीटेट का प्रमुख स्रोत है। विश्व में लगभग 5000 टन सिट्रोनेला तेल का उत्पादन प्रति साल होता है।

जावा घास या सिट्रोनेला सुगन्धित तेल वाली बहुवर्षीय घास है जिसे वैज्ञानिक भाषा में सिम्बोपोगॉन विन्टेरियेनस के नाम से जाना जाता है। इसकी पत्तियों से तेल आसवित किया जाता है। जिसके मुख्य रासायनिक घटक सिट्रेनेलोल, सिट्रोनेलॉल और जिरेनियॉल इत्यादि हैं। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, साबुन, सुगन्ध उद्योग व मच्छर भगाने वाले उत्पादों में बहुतायत से किया जाता है। भारत में सिट्रोनेला का उत्पादन उत्तरी पूर्वी राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र में किसानों और उद्यमियों द्वारा किया जाता है। उत्पादक देशों में श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया, भूटान इत्यादि प्रमुख देश हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में सिट्रोनेला की खेती लगभग 2000 हेक्टेयर में की जाती है। जिसके द्वारा लगभग 200 टन तेल उत्पादित किया जाता है।

खेत की जुताई व मिट्टी की तैयारी

सिट्रोनेला की खेती के लिये उत्तर पूर्वी क्षेत्र एवं तराई क्षेत्र की समुचित जल निकास वाली भुरभुरी व अच्छी उर्वरा शक्ति युक्त भूमि उपयुक्त रहती है। भूमि का पीएच 5-7 के बीच सर्वोत्तम रहता है। सिट्रोनेला के लिये भूमि को अच्छी तरह 2 से 3 जुताइयाँ करके पाटा लगा देते हैं इसके उपरान्त आवश्यकतानुसार छोटी-छोटी क्यारियाँ बना ली जाती हैं। 

उर्वरक 

फसल को सन्तुलित मात्रा में सभी प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है इसलिये 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद एवं एक महीने पूर्व भूमि में अच्छी तरह जुताई के साथ मिला देनी चाहिए। केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान द्वारा जावा घास की उन्नतशील किस्में सिम-जावा, बायो-13, मंजूषा, मंदाकिनी, जलपल्लवी विकसित की गई हैं। जड़दार कलमों अथवा स्लिप्स को लगभग 50X40 या 60X30 सेंटीमीटर की दूरी पर मिट्टी में अच्छी तरह दबाकर रोपना चाहिए। सामान्यतः इसकी रोपाई फरवरी/मार्च अथवा जुलाई-अगस्त महीने की जाती है।

20 से 25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या 10 से 15 टन वर्मीकम्पोस्ट अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए। 150:60:60 किग्रा क्रमशः नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश (तत्व के रूप में) प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष देना चाहिए। नत्रजन की मात्रा को 4 बार में बराबर मात्रा में देनी चाहिए तथा फास्फोरस एवं पोटाश लगाने के पूर्व अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देते हैं। पहली सिंचाई पौधरोपण के तुरन्त बाद तथा बाद की सिंचाइयाँ आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। अधिक एवं कम पानी का फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है यदि पर्याप्त वर्षा हो रही हो तब सिंचाई न करें। 

 

जलवायु और सिंचाई

जावा घास की बढ़वार के लिए पर्याप्त नवमी की आवश्यकता होती है। अतः जहां वार्षिक वर्षा लगभग 200 से 250 से में होती है, अधिक सिंचाइयों की आवश्यकता नहीं पड़ती, परन्तु उत्तर भारत में दिसंबर से जून तक लगभग 6-8 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।

निराई कटाई 

फसल स्थापित होने के पहली अवस्था फसल रोपने के लगभग 20 से 25 दिन बाद पहली निराई तथा दूसरी निराई 40 से 45 दिन बाद करना चाहिए। इस प्रकार से लगभग 1 वर्ष में 4 से 5 निराइयों की आवश्यकता होती है। पहली कटाई रोपण 4-5 माह बाद और इसके बाद तीन माह के अन्तराल पर वर्ष में 3-4 कटाइयाँ करते रहना चाहिए। जमीन से 15-20 सेंटीमीटर की ऊँचाई पर कटाई करनी चाहिए। जावाघास के शाक का वाष्प आसवन या जल आसवन कर तेल प्राप्त करते हैं। इसकी शाक को काटकर अर्द्ध मुरझाई अवस्था में आसवित करते हैं। 

जावा घास का सम्पूर्ण आसवन करने में लगभग 3 से 4 घंटे लगते हैं। जावा घास की बायो-13 प्रजाति से पाँच वर्ष की फसल के आधार पर तेल की उपज 200-250 किग्रा प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष प्राप्त हो जाती है। विभिन्न कृषि कार्यों व आसवन पर व्यय लगभग रुपए 40,000 से 45,000 प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष होता है तथा कुल आय रुपए 1,60,000/- से 2,00,000/- प्रतिवर्ष तथा शुद्ध लाभ औसत रुपए 1,20,000 से 1,60,000 प्रतिवर्ष प्राप्त होती है।

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