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Updated: 5 days 1 hour ago

किसानों के लिए मुसीबत बना लौटता मानसून, कटाई के लिए खड़ी फसल को हो रहा नुकसान

25 September 2018 - 8:08am

उत्तर भारत में पिछले तीन दिनों से हो रही बारिश से राहत तो मिली है, लेकिन किसानों के लिए मुसीबत हो गई है। कटाई के लिए खड़ी फसल को काफी नुकसान पहुंचा है। खासकर धान, कपास, सोयाबीन व उड़द की फसल को। बारिश के कारण किसानों के चेहरे पर चिंता साफ देखी जा सकती है। इस बारिश से किसानों को 20 से 25 फीसदी नुकसान होने की आशंका है।

यही मौसम अगले 2-3 दिन और रहा तो यह नुकसान का दायरा बढ़ सकता है। जानकारों की मानें तो इस बारिश से किसानों को हर तरह से नुकसान है। जो फसल कट गई है, उसका मंडी में सही दाम नहीं मिलेगा और जो फसल खेत में खड़ी है, वह जमीन में बिछ गई है। इससे कटाई की लागत बढ़ जाएगी और उत्पादन भी कम होगा। सबसे ज्यादा नुकसान पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसानों को होने की आशंका है।

Tags: बारिशमौसमपंजाबहरियाणामध्य प्रदेशउत्तर प्रदेशफसलकिसानखेत

वर्षभर में दो बार खेती की जा सकती है स्वीट कॉर्न की खेती

20 September 2018 - 3:42pm

शॉपिंग मॉल में फिल्म देखते समय ब्रेक के दौरान आपने भुट्टे का स्वाद जरूर चखा होगा। बिल्कुल उसी स्वीट कॉर्न की बात कर रहे हैं, जो प्रति प्लेट लगभग 80 रुपये मिलता है। शक्कर के दाने की तरह मीठा यह भुट्टा कहीं बाहर से नहीं, बल्कि एग्रीकल्चर विवि समेत प्रदेश के कुछ जिलों से लाया जाता है। ट्रायल के तौर पर पिछले दो वर्ष से विवि में संचालित सुनियोजित कृषि विकास केन्द्र (पीएफडीसी) के तहत स्वीट कॉर्न फसल लगाई गई है। इसके दाने शक्कर की मिठास से कम नहीं हैं। हालांकि अनुसंधान कार्य के अंतर्गत चल रही इस योजना को लेकर किसान काफी उत्साहित हैं। वहीं पीएफडीसी के प्रमुख अन्वेषक डॉ. घनश्याम साहू ने बताया कि मीठा मक्का किसानों के लिए मुनाफे का सौदा हो सकता है। सुनियोचित तरीके से किसानी करने की जरूरत है।

कम अवधि में तैयार

इसकी फसल की अवधि 70 से 90 दिन तक होती है, जिसे प्रदेश में वर्षभर में दो बार खेती की जा सकती है। खरीफ के मौसम में जून-जुलाई और अक्टूबर से 15 नवबंर तक बोनी करने से अच्छी पैदावार होगी। वहीं स्वीट कॉन को सीधे कच्चा या उबालकर, भुनकर भी खाया जा सकता है। इसके अलावा यह फसल सभी तरह की मिट्टयों में उगाया जा सकता है। वहीं संपूण भारत वर्ष के लिए अनुसंक्षित किस्म खरीफ के मौसम में स्वीट ग्लोरी, एचएससी-1 और खरीफ मौसम में स्वीट-70, स्वीट-72 है।इसकी पैदावार औसतन खरीफ में 110 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टयर। रबी मौसम में 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा भुट्टे की होती है।

 

टपक सिंचाई बेहतर

डॉ. साहू ने बताया कि मक्का की खेती करने के दौरान यदि किसान टपक सिंचाई के साथ पलवार लगाकर करे। तो उत्पादन क्षमता में बढोत्तरी होगी। इसके अलावा खेती के लिए बहुत अधिक रकबे की भी जरूरत नहीं है। जितनी भी खेती उपलब्ध हो इस फसल को लगाया जा सकता है। जो किसानों की आय में बढ़ोतरी करने के साथ मिट्टी को भी उपजाऊ बनाने का कार्य करता है।

 

आय में बढ़ोतरी

मीठा मक्का किसानों के लिए मुनाफे का सौदा हो सकता है। बस सुनियोचित तरीके से किसानी करने की जरूरत है। इसकी पैदावार हर मिट्टी में की जा सकती है।

Tags: मक्काबाजराफसलमौसमकिसानजूनजुलाईअक्टूबरस्वीट कॉर्नagricare: जैविक कृषि सुरक्षा

अमरूद की खेती

12 September 2018 - 5:23pm

भूमि

अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है परंतु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दोमट भूमि अच्छी पाई गई है यद्यपि अमरूद की खेती 4.5 से 9.0 पी.एच.मान वाली मिट्टी में की जा सकती है परंतु 7.5 पी.एच.मान से ऊपर वाली मृदा में उकठा (विल्ट) रोग के प्रकोप की संभावना अधिक होती है।

 

उन्नत किस्में

ललित, इलाहाबाद, सफेदा, लखनऊ-49, अर्का मृदुला, चित्तीदार, ग्वालियर-27, एपिल कलर,बेदाना, लाल गूदे वाली किस्म, धारीदार आदि।

 

संकर किस्में

सफेद जाम, कोहीर सफेदा, अर्का अमूलिया, हाइब्रिड 16-1 आदि।

 

प्रवर्धन

अमरूद का प्रसारण बीज तथा वानस्पतिक विधियों द्वारा किया जा सकता है लेकिन बीज द्वारा प्रसारित पौधों की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है तथा फल आने में अधिक समय लेते हैं। अत: अमरूद का बाग लगाने के लिये वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार पौधों का ही उपयोग करना चाहिये। इसके व्यावसायिक प्रसारण के लिये गूटी, पेच बडिंग, विनियर एवं भेंट कलम विधि का प्रयोग करके पौधे तैयार करना चाहिये।

सघन बागवानी/रोपण
अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं। सघन रोपण में प्रति हेक्टेयर 500 से 5000 पौधे रखे जाते है तथा समय-समय पर कटाई-छंटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखा जाता है। इस तरह की बागवानी से 300 से 500 क्विंटल उत्पादन प्रति हेक्टेयर लिया जा सकता है जबकि पारम्परिक विधि से लगाये गये बगीचों का उत्पादन 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है।

अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। यह विटामिन ‘सी’ एवं प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत है। फलों को ताजा खाने के अतिरिक्त जैम, जैली व टॉफी बनाई जा सकती है। यह असिंचित एवं सिंचित क्षेत्रों में सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा

प्रति पौधा प्रति वर्ष खाद एवं उर्वरक की मात्रा निम्नानुसार है-

खाद, उर्वरक देने का समय एवं विधि 

अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़े तने के आसपास एवं 30 से.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि खाद पेड़ के फैलाव में 15-20 से.मी. की गहराई में नालियां बनाकर देना चाहिये। गोबर खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में बारिश होने पर तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में बारिश समाप्त होने के पहले देना चाहिये।
उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 5 किलो ग्राम (0.5 प्रतिशत) जिंक सल्फेट प्रति हेक्टर का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में सफलता पाई गई है।

जैविक खाद

अमरूद में नीम की खली 600 ग्रा. प्रति पौधा डालने से उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्तम गुण वाले फेल प्राप्त किये जा सकते हैं। 40 कि.ग्रा. गोबर खाद अथवा 4 कि.ग्रा. वर्मी कम्पोस्ट के साथ 100 ग्राम जैविक खाद जैसे एजोस्पाइरिलम एवं फास्फोरस घोलक जीवाणु (पीएसबी) के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि एवं अच्छी गुणवत्ता वाले फल पाये गये हैं।
उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 5 किलो ग्राम (0.5 प्रतिशत) जिंक सल्फेट प्रति हेक्टर का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौैधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में सफलता पाई गई है।

सिंचाई

अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई भारी भूमि में 10-15 दिन के अंतर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अंतर से सिंचाई करते रहना चाहिये। गर्मियों में यह अंतराल कम किया जा सकता है। दो वर्ष से अधिक उम्र के पौधों को भारी भूमि में 20 दिन तथा हल्की भूमि में 10 दिन अंतर से पानी थाला बनाकर देना चाहिये। पुराने एवं फलदार पेड़ों की सिंचाई वर्षा बाद 20-25 दिन के अंतर से जब तक फसल बढ़ती है, करते रहना चाहिये तथा फसल तोडऩे के बाद सिंचाई बंद कर देना चाहिए।

मल्चिंग/बिछावन

असिंचित क्षेत्रों में वर्षा के जल को अमरूद में थाले बनाकर सिंचित करें तथा सितम्बर माह के पास घास एवं पत्तियां बिछाकर नमी को संरक्षित करके उत्पादन में वृद्धि तथा उत्तम गुण वाले फल प्राप्त किये जा सकते हैं।

कटाई – छंटाई

प्रारंभिक अवस्था में कटाई-छंटाई का मुख्य कार्य पौधों को आकार देना होता है। पौधों को साधने के लिये सबसे पहले उन्हें 60-90 से.मी. तक सीधा बढऩे देते हैं फिर इस ऊंचाई के बाद 15-20 से.मी. के अंतर पर 3-4 शाखायें चुन ली जाती हैं। इसके पश्चात मुख्य तने के शीर्ष एवं किनारे की शाखाओं की कटाई-छंटाई कर देनी चाहिये जिससे पेड़ का आकार नियंत्रित रहे। बड़े पेड़ों में सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों को निकालते रहना चाहिये। तने के आसपास तथा भूमि के पास से निकलने वाले प्ररोहों को भी निकालते रहना चाहिये नहीं तो पौधों की बाढ़ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पुराने पौधों जिनकी उत्पादन क्षमता घट गई हो उनकी मुख्य एवं द्वितीयक शाखाओं की कटाई करने से नई शाखायें आती हैं तथा उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है।

अंतरवर्तीय फसलें

प्रारंभ के दो तीन वर्षों में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर, फ्रेन्चबीन, गोभी एवं मेथी खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूंग एवं सोयाबीन तथा जायद (गर्मियों) में कद्दूवर्गीय सब्जियां उगाई जा सकती है, लेकिन बेल वाली सब्जियों उगाते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि बेल पौधों के ऊपर व चढऩे पायें।

फलन उपचार (बहार ट्रीटमेंट)

अमरूद में एक वर्ष में तीन फसलें ली जा सकती हैं लेकिन आमतौर पर वर्ष में एक फसल लेने का सुझाव दिया जाता है। फसल तोडऩे के मौसम के अनुसार इसे तीन मौसमों बरसात, जाड़ा एवं बसंत में विभाजित किया जा सकता है। स्थान एवं फसल के बाजार भाव को ध्यान में रखते हुए उपरोक्त में से कोई एक फसल ली जा सकती है। इस अवधि में दूसरी मौसम की फसल नहीं लेनी चाहिये मध्यप्रदेश में फूलने के तीन मौसम हैं। बसंत ऋतु ( मार्च-अप्रैल), वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) और शरद ऋतु में, वर्षा के फूलों से फल ठंड में तथा शरद ऋतु के फूलों से फल बसंत ऋतु में आते हैं।
बरसात की फसल के फल जल्दी पक जाते है तथा उत्तम गुण वाले नहीं होते हैं इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप भी अधिक होता है जबकि जाड़े की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते है तथा फलों में विटामिन – सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। बरसात की फसल में विटामिन -सी की मात्रा ठंड की फसल लगभग आधी पाई जाती है तथा वर्षात की फसल को बाजार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता है। अत: ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती है। बरसात की फसल को रोकने के लिये एवं ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करना चाहिये-
1 फरवरी से जून तक पौधों को पानी नहीं देना चाहिये। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करना चाहिये जिससे बसंत ऋतु में आये फूल गिर जाते हैं तथा वर्षात में फूल काफी संख्या में आते हैं।
110 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव मार्च या अप्रैल में करने से बसंत ऋतु में आये फूल एवं पत्तियां झड़ जाती है तथा मृग बहार (वर्षात के फूल) अच्छी आती हैं।
1 बसंत ऋतु के फूलों को गिराने के लिये 100-200 पी.पी.एम.नेफ्थलीन एसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव फूलों के ऊपर 20 दिन के अंतराल में दो बार करने से सफलता पाई गई है।
 

उपज
तीन से चार वर्ष में फलन शुरू हो जाता है। 5 या 6 वर्ष में वृक्ष से अनुमानित 500-600 फल तथा 8 से 10 वर्ष शुरू से अनुमानत: 1000-2000 फल प्राप्त होते है।

पौध रोपण

अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहां पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते है। बाग लगाने के लिये खेत को समतल कर लेना चाहिये। इसके पश्चात पौधे लगाने के लिये निश्चित दूरी पर 60 & 60 & 60 से.मी. (लम्बा, चौड़ा, गहरा) आकार के गड्ढे तैयार कर लेना चाहिये। इन गड्ढों में 15-20 कि.ग्रा. अच्छी सड़ी हुई गोबर खाद, 500 ग्राम सुपर फास्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 25 ग्राम एल्ड्रेक्स चूर्ण को अच्छी तरह से मिट्टी में मिलाकर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर देना चाहिये। बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विशेष एवं जलवायु पर निर्भर करती है। बीजू पौधों को कलमी पौधे से ज्यादा जगह की आवश्यकता होती है। इस प्रकार कम उपजाऊ भूमि में 4 & 4 मी., 8 & 8 मीटर की दूरी पर पौधे लगाने की सिफारिश की जाती है।

जैविक खेती: बागवानी

सोयाबीन में लगने वाले कीट एवं रोगों की पहचान तथा उपचार

10 September 2018 - 11:36am

सोयाबीन विश्व की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी व ग्रंथिफुल फसल हें. यह एक बहूद्धेशीय व एक वर्षीय पोधे की फसल हें. यह भारत की नंबर वन तिलहनी फसल हें सोयाबीन का वानस्पतिक नाम गलाइसीन मैक्स हे इसका कुल लेग्युमिनेसी के रूप में बहुत कम उपयोग किया जाता हें. सोयाबीन का उद्गम स्थान अमेरिका हें इसका उत्पादन चीन, भारत आदि देश में हें. सोयाबीन की खेती सम्पूर्ण भारत में की जाती हें लेकिन देश में प्रथम मध्य्प्रधेश दूसरा महाराष्ट्र तीसरा राजस्थान राज्य हें।

मौसम में लगातार उतार-चढ़ाव से मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसी कई राज्यों की प्रमुख फसल सोयाबीन में कई तरह के कीट व रोगों का प्रकोप बढ़ गया है। भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि अगर सही समय पर इनका रोकथाम नहीं किया गया तो किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

ताना छेदक कीट

ताना मक्खी (मेलेनेग्रोमइजा फैजियोलाई)

पहचान : मादा मक्खी आकर में 2 मि.मि. लम्बी होती है | मक्खी का रंग पहले भूरा तथा बाद में चमकदार काला हो जाता है | मादा मक्खी अण्डे पत्ती की निचली सतह पर देती है जो की हलके पीले सफेद रंग के होते है | इल्ली हमेशा ताने के अंदर रहती है तथा बिना पैरों वाली एवं हल्के पीले सफेद रंग की होती है शंखी भरे रंग की एवं ताने के अंदर ही पाई जाती है |

प्रकोप : प्रारंभिक अवस्था में प्रकोपित पौधे मर जाते हैं | बीज पत्रों में प्रकोप के कारण टेड़ी- मेढ़ी लकीरे बनती है | इल्ली पट्टी के शिरे से डंठल को अन्दर से खातें हुए ताने में प्रवेश करती है | कीट प्रकोप से प्रारंभिक वृद्धि अवस्था (दो से तिन पत्ती ) में 20 – 30% पौधे प्रकोपित होते है | इल्ली का प्रकोप फसल कटाई तक होता है | फसल में कीट प्रकोप से 25 – 30 % उपज की हानि होती है |

जीवन चक्र : मादा मक्खी शंखी से निकलने के पश्चात् पत्ती अ बीज पत्रों के बीच 14 से 64 अण्डे देती है | अण्डकाल 2 – 3 दिनों का होता है | इल्ली काल 7 – 12 दिनों का होता है | इल्ली अपना एल्लिकल पूर्ण करने के पूर्व ताने में एक निकासी छिद्र बनाकर शंखी में बदलती है | शंखी 5 –9 दिनों में वयस्क कीट में बदलती है | कीट की साल भर में 8 –9 पीढ़ियां होती है |

पोषक पौधे : रबी मौसम में मटर,सेम,और गर्मियो में उड़द , मूंग आदि |

नियंत्रण

कृषिगत नियंत्रण : समय पर बुवाई करें | देर से बुवाई करने से पौधे में कीट प्रकोप बढ़ जाता है |बुआई हेतु अनुशंसित बीज दर का उपयोग करें |प्रकोपित पौधों को उखाड़ कर नष्ट करें |

रसायनिक नियंत्रण : थायोमेथाक्सम 70 डब्ल्यू.एस.3 ग्राम/किलो ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल.कब्रोफ्यूरान 3 जी का 30 किलोग्राम/हेक्टेयर की दर से बोआई के समय करें | एक या दो छिडकाव डायमिथोएट 30 ई.सी. 700 मि.ली. या इमिडाक्लोप्रिड 200मि.ली. अथवा थायोमेथाक्सम 25 डब्ल्यू. जी. का 100ग्राम प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव करें | हमेशा होलोकोन नोजल का उपयोग छिडकाव हेतु करें |

चक्र भृंग (ओबेरिया ब्रेविस)

पहचान : वयस्क भृंग 7 – 10मि.मि.लम्बा, 2 से 4 मि.मि.चौरा तथा मादा नर की अपेछा बड़ी होती है | भृंग का सिर  एवं वक्ष नारंगी रंग का होता है  |पंख वक्ष से जुड़ा होता है | पंख का रंग गहरा भूरा – काला ,श्रृंगिकाएं कलि तथा शारीर से बड़ी होती है | अण्डे पीले रंग के लम्बे गोलाकार होते है , पूर्ण विकसित इल्ली पीले रंग की 19 – 22 मि.मि. लम्बी तथा शारीर खंडो में विभाजित व सिर भूरा रंग का होता है |

प्रकोप : पौधों में जहां पर्णवृन्त,टहनी या ताने पर चक्र बनाए जाते है , उसके ऊपर का भाग कुम्ल्हा कर सुख जाता है | मुख्य रूप से ग्रब (इल्ली) द्वारा नुकसान होता है | इल्ली पौधे के तने को अन्दर से खाकर खोखला कर देता है | पूर्ण विकसित इल्ली फसल पकने के समय पौधों को 15से 25 से.मि. ऊचाई से काटकर निचे गिरा देती है जिससे अपरिपक्व फल्लियाँ उपयोग लायक नही होती है | प्रकोपित फसल में अधिक नुकसान होने पर करीब 50% तक हनी होती है |

जीवन चक्र : चक्र भृंग कीट का स्किरोये समय जुलाई से अक्टूबर माह तथा अगस्त से सितंबर माह में अधिक नुकसान होता है | मादा कीट अण्डे देने के लिए पौधे के पत्ती, टहनी अ ताने के डंठल पर मुखंगो द्वारा दो चक्र 6- 15 मि.मि. की दुरी पर बनती है | मादा कीट संपूर्ण जीवन कल में 10 – 70 अण्डे देती है अण्डो से 8 दिनों में झिल्लियाँ निकलती है | जुलाई माह में दिये अण्डो से निकली इल्ली का इल्ली – कल 32 से 65 दिनों का होता है | तद्पश्चात इल्ली शंखी में परिवर्तित हो जाती है |

फसल काटने से पहल इल्लियाँ पौधों को भूमि के ऊपर से कट देती है तथा स्वंय उपरी कटे हुए पौधे के अन्दर रह जाती है | कुछ दिनों पश्चात इल्लियाँ पुन: ऊपरीकटे हुए पौधों में से एक टुकड़ा 18 से 25 मि.मि. लम्बा काटती है | फिर ये इल्लियाँ इस टुकड़े में आ जाती है तथा भूमि दरारों में विशेषकर मेड़ों के पास जमीं के अन्दर टुकड़े का दूसरा छोर भी कुतरने से बंद कर सुसुप्तावस्था (248-308 दिनों हेतु) में इल्ली जीवन चक्र शुरू करती है | शंखी से वयस्क कीट 8 – 11 दिनों में निकलते है |

पोषक पौधे : मूंग,उड़द एवं खरपतवार, जंगली जूट, बुरवडा आदि |

नियंत्रण :

कृषिगत नियंत्रण : जिन क्षेत्रों में कीट प्रकोप प्रतिवर्ष होता है वहां पर ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई अवश्य करें | मेढ़ों की सफाई करें तथा समय से खरपतवार नियंत्रण करे |फसल की बुआई समय से (जुलाई) करें | समय से पूर्व बुआई करने से कीट प्रकोप ज्यादा होता है | बुआई हेतु 70 – 80 किलो ग्राम प्रति हेक्टेर बीज दर का उपयोग करें | फसल में उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा समय से डालें विशेषकर पोटाश की मात्रा जरुर डाले | अन्त्र्वार्तीय फसल ज्वार या मक्का के साथ बुआई न करें |

यांत्रिक नियंत्रण : प्रभावित पोधे के भाग को चक्र के नीचे से तोड़ कर नष्ट कर दें |

रसायनिक नियंत्रण : फसल पर कीट के अण्डे देने की शुरुआत पर निम्न में से किसी एक कीटनाशक का छिड़काव कीट नियंत्रण हेतु करे | ट्रायाजोफांस 40ई.सी. 800 मि.ली. अथवा इथोफेनप्राक्स10 ई.सी.1000 मि.ली. प्रति हेक्टेयर |

पत्तियाँ खाने वाले कीट

हर्री अर्द्धकुण्डलाकार इल्ली (क्रायासोड़ेंकसीस एकयुटा)

पहचान : शलभ के अग्र पंखो पर दो छोटे चमकीले सफेद रंग के धब्बे होते है | जो की अत्यंत पास होने के कारण अंग्रेजी के अंक आठ (8) के आकर के दिखते हैं | अण्डे हलके पीले रंग के एवं गोल होते है जो की इल्लियों के निकलने के पहले काले पड़. जाते है | एल्लियादिन में समान्त: पत्तियों के निचे बैठी रहती है | पूर्ण विकसित इल्ली 37 से 40 मि.मी. लम्बी होती है | एवं पश्च भाग मोटा होता है | इल्लियों के पृष्ट भाग पर एक लम्बवत पिली तथा शारीर के दोनों ओर एक – एक सफेद धारी होती है इल्लियों के पृष्ठ भाग पर एक लम्बवत पीली तथा शारीर के दोनों ओर एक – एक सफेद धारी होती है | शंख प्रारंभ में हलके पीले रंग की तथा कालान्तर में भूरे रंग की होती है शंखी 19 मि.मी.लम्बी तथा 7 मि.मी. चौड़ी होती है |

प्रकोप : इल्लियाँ पत्तियों, फूलों एवं फल्लियों को खा कर क्षति पहुँचती है | बड़ी इल्लियाँ छोटी विकसित होती हुई फल्लियों को कुतर – कुतर कर खाती है तथा बड़ी फल्लियों में छेद कर बढ़ते हुए दानों को खाती है | अधिक प्रकोप होने पर करीब 30% फल्लियाँ अविकसित रह जाती है तथा उनमे डेन नहीं भरते |

जीवन चक्र : मादा शलभ अपने जीवन कल में 40 से 200 अण्डे देती है अत्यधिक ज्यादा प्रकोप होने पर पत्ती डंठल या तानों पर भी अण्डे देती है | अण्डे हलके पीले रंग के एवं गोल होते है जो की इल्लियों के निकलने के पहले काले पड़ जाते है | अण्डकाल 3 से 5 दिनों का होता है | इल्ली कल 14 – 15 दिनों का होता है | शंखी से वयस्क 5 – 7 दिनों में निकलते है | कीट अपना एक जीवन चक्र 24 – 26 दिनों में पूर्ण करता है |

पोषक पौधे : मटर, मूली, सरसों, मूंगफली, पत्तागोभी, आलू, कददूवर्गीय पौधे, करडी, बरसीम आदि |

नियंत्रण :

हरी अर्द्धकुण्डलाकार इल्ली (डायक्रीसिया ओरिचैलिशया)

पहचान : वयस्क शलभ मध्यम आकर एवं सुनहरा पीले रंग की होती है | अग्र पंखों का रंग भूरा जिस पर बड़ा सुनहरा तिकोन धब्बा होता है | अण्डे पीले रंग के एवं गोल होते है नवजात इल्लियाँ हरे रंग की होती है | पूर्ण विकसित इल्ली 4 मि.मी. लम्बी होती है | शंख का रंग भूरा होता है |

प्रकोप :अण्डो से निकलकर छोटी – छोटी इल्लियाँ सोयाबीन के कोमल पत्तियाँ को खुरच कर खाती है तथा बड़ी इल्लियाँ पत्तियों को खाकर नुकसान करती है | अत्यधिक प्रकोप पर पौधा पर्ण विहीन हो जाता है | ये बदली के मौसम में छोटी फल्लियों को खा जाती है तथा बड़ी फल्ल्यों के बढ़ते दानों को फली में छेदकर खाती है |

जीवन चक्र : मादा शलभ साधारणत: पत्ती की निचली सतह पर एक – एक कर अण्डे देती है पर प्रकोप ज्यादा होने की दशा में पत्तियों के डंठल, शाखा एवं ताने पर भी अण्डे देती है | अण्डकाल 3 – 4 दिनों का वयस्क शलभ 2 – 7 दिनों तक जीवित रहती है | जीवन चक्र 27 – 30 दिनों में पूर्ण होता है |

पोषक पौधे : मटर, फूलगोभी, मूली, आलू, अलसी आदि

हरी अर्द्धकुण्डलाकार इल्ली (गिसोनिया गेमा)

पहचान : शलभ की लम्बाई 7.3 मि.मी. तथा पंख फैलाव पर 19.4 मि.मी. होती है | शलभ पिली भूरी रंग की होती है जिसके अगले पंख पर तिन लहरदार गहरे भूरी पट्टियांएवं पिछले पंख झिल्लीनुमा गहरे भरे रंग के होते है |अण्डे दुधिया सफेद, गोलाकार पर ऊपरी छोर पर कुछ अन्दर दबा हुआ तथा ऊपर से निचे धारियों तथा आकार में 0.32 मि.मी. के होते हैं | नवजात इल्ली अर्धप्रदर्शी, दुधिया सफेद तथा 0.17 मि.मी. आकर में.होती है | पूर्ण विकसित इल्ली 19 मि.मी. लम्बी तथा 2 मि.मी. चौडाई की होती है तथा पृष्ट भाग पर लम्बवत शरीर के दोनो ओर एक – एक सफेद धारी होती है | शंखी 7 मि.मी. लम्बी तथा 2.5 मि.मी. चौडाई होती है |

जीवन चक्र : मादा शलभ एक – एक करके अण्डे पत्ती की उपरी सतह पर देती है | मादा शलभ अपने जीवन कल में 160 अण्डे देती है | सम्पूर्ण इल्ली अवस्था 11 दिनों की तथा शंखी अवस्था 5 – 9 दिनों की होती है | इल्लीकाल पूर्ण कर सफेद रेशों एवं पत्ती से मिश्रित बने कोए में शंखी में परिवर्तित हो जाती है | पूर्ण जीवन चक्र 26 – 27 दिनों का होता है |

पोषक पौधे : मूंग एवं उड़द आदि |

प्रकोप : यह कीट सोअबिं पर अगस्त के प्रथम सप्ताह से सितंबर के तृतीये सप्ताह तक सक्रिय रहता है | इल्ली अवस्था फसल की पत्तियाँ खाकर नुकसान पहुँचती है | जिससे पत्तियों पर छोटे – छोटे छिद्र बनते है | तृतीय अवस्था की इल्ली द्वारा पत्तियो में छोटे – छोटे छेद् बनाकर खाती है जबकी  बड़ी इल्लियाँ पत्तियोंपर बड़े एवं अनियमित छेद करती है अधिक प्रकोप अवस्था में फसल की पत्तियों के केवल शिराएँ बची रह जाती है |

साधारण : कीट इल्लियों द्वारा फूल एवं फल्लियाँ खाकर नष्ट करती है |

नियंत्रण : निरंतर फसल की निगरानी करते रहें | जब कीट की संख्या आर्थिक क्षति स्तर (तिन इल्ली/मी. कतार फूल अवस्था) से ऊपर होने सिफारिस अनुसार ही कीटनाशक का छिड़काव करें |

भूरी धारीदार अर्धकुण्डलक इल्ली (मोसिस अनडाटा)

पहचान : वयस्क शलभ काले भूरे रंग के एवं आकर में अन्य अर्धकुण्डलक शलभ से बड़ी होती है | जिसका पंख फैलाव 35 – 45 मि.मी. होता है | अग्र पंखों पर तीन धूये के रंग की पट्टियां पाई जाती है | अण्डे हलके हरे रंग के गोल होते है | नवजात इल्लियाँ हरे रंग की होती है | जिनके शारीर पर छोटे छोटे रोंये पाये जाते है |तथा सिर भूरे रंग का होता है | पूर्ण विकसित इल्लियाँ 40 – 50 मि.मी. लम्बी, भूरे – काले रंग की तथा शरीर पर भूरी पिली या नारंगी लम्बवत धारियाँ होती है | शंखी भूरे रंग की एवं की एवं सफेद धागों तथा पत्तियाँ के मिश्रण से बने कोये में पाई जाती है |

जीवन चक्र : मादा अपने जीवन काल में 50 – 200 अण्डे देती है | जिसमे से 3 – 5 दिनों में नवजात इल्लियाँ निकलती है | इल्लियाँ 6 – 7 बार त्वचा निमोर्चन कर 17 – 22 दिनों में अपना ईल्लिकाल पूर्ण कर सफेद रेशो एवं पत्ती से मिश्रित बने कोये में शंखी में परिर्वतित हो जाती है | शंखी कल 8 – 17 दिनों का होता है | वयस्क कीट 7 – 20 दिनों तक जीवित रहते है | कीट का जीवन चक्र सितंबर में 31 – 35 दिनों का जबकि अक्टूबर से दिसम्बर में 38 – 43 दिनों का होता है |

पोषक पौधे : मूंग एवं सेम आदि |

प्रकोप : इसका कीट प्रकोप कम वर्षा सूखे की दशा में ज्यादा होता है | यह कीट इल्ली अवस्था में अगस्त से अक्टूबर माह में सोयाबीन में नुकसान पहुंचाती है | प्रकोप ज्यादा होने की दशा में कीट पौधों को पत्ती विहीन कर देता है जिससे फल्लियाँ कम बनती है |

नियंत्रण हेतु : निरंतर फसल की निगरानी करते रहें | यदि कीट की संख्या कम होने पर कीटनाशक का छिडकाव न करें | कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर सिफारिस अनुसार कीटनाशक दवाओं का छिडकाव करें

तम्बाकू की इल्ली (स्पोड़ोपटेरा लिटूरा)

पहचान : वयस्क शलभ जिसका रंग मटमैला भूरा होता है | अग्र पंख सुनहरे – भूरे रंग के सिरों पर टेड़ी – मेढ़ी धारियां तथा धब्बे होते है | पश्च – पंख सफेद तथा भरे किनारो वाले होते है | नवजात इल्लियाँ मटमैले – हरे रंग की होती है पूर्ण विकसित इल्लियाँ हरे, भूरे या कत्थाई रंग होती है शरीर के प्रतेक खंड के दोनों तरफ काले तिकोन धब्बे इसकी विशेष पहचान है | इसके उदर के प्रथम एवं अंतिम खंडों पर काले धब्बे एवं शारीर पर हरी – पिली गहरी नारंगी धारियाँ होती है | पूर्ण विकसित इल्लियाँ 35 – 40 मि.मी. लम्बी होती है |

प्रकोप : यह कीट सामान्यत: अगस्त से सितंबर तक नुकसान करती है | नवजात इल्लियाँ समूह में रहकर पत्तियों का पर्ण हरित खुरचकर खाती है जिससे ग्रसित पत्तियाँ जालीदार हो जाती है जो की दूर से ही देख कर पहचानी जा सकती है | पूर्ण विकसित इल्ली पत्ती, कलि एवं फली तक को नुकसान करती है |

जीवन चक्र : मादा शलभ द्वारा 1000 – 2000 तक अण्डे अपने जीवन कल में देती है तथा 50 – 300 अण्डे प्रति अण्डा – गुच्छ में पत्तियों की निचली सतह पर दी जाते है |अण्डा – गुच्छों को मादा अपने शरीर के भूरे बालों द्वारा ढक देती है | अंडा अवस्था 3 – 7 दिनों का होती है |अण्डो से 2 – 3 दिनों में इल्लियाँ निकलती है | नवजात इल्लियाँ पीले – हरे रंग की होती है जो 4 – 5 दिनों तक पत्ती की निचली सतह पर ही समूह में रह पर्ण – हरित खुरच – खुरच कर जाती है | पूर्ण विकसित इल्ली 30 – 40 मि.मी. लम्बी होती है तथा 20 – 22 दिनों में शंखी में बदली जाती है | शंखी भूमि के भीतर कोये में पाई जाती है | शंखी में से 8 – 10 दिनों बाद वयस्क शलभ निकलते है | सोयाबीन फसल पर इस कीट का पूरा जीवन चक्र 30 – 37 दिनों का होता है | यह सर्वभक्षी कीट है |

पौषक पोधे : कपास तम्बाकू, टमाटर, गोभी, गाजर, बैगन, सूर्यमुखी, अरन्डी, उड़द, मुंगफली आदि |

आर्थिक क्षति स्तर : 10 इल्ली प्रति मीटर कतार |

नियंत्रण

कृषिगत नियंत्रण : बुआई हेतु अनुशंसित (70 – 100 कि.) बीज दर का उपयोग करें | नियमित फसल चक्र अपनाये |

यांत्रिक नियंत्रण : फिरोमोन ट्रेप 10 – 12 / हेक्टेयर लगाकर कीट प्रकोप का आंकलन एवं उनकी संख्या कम करें | अण्डे व इल्लियों के समूह को इक्कठा कर नष्ट कर दें | 40 – 50 / हे, खूंटी लगायें |

रासानिक नियंत्रण :    

बिहार कम्बलिया कीट (स्पोईलोसोमा ओबलीकुआ)

पहचान :शलभ का सर, वक्ष और शारीर का निचला हिस्सा हल्का पिला एवं उपरी भाग गुलाबी रंग का श्रृंगिकाये व आँखे काली तथा पंख हलके पीले जिन पर छोटे – छोटे काले धब्बे पाये जाते है | शलभ पंख फैलाव पर करीब 40 – 60 मि.मी. होता है | अण्डे पहले हरे तथा परिपक होने पर काले हो जाट है |नवजात इल्लियाँ पिली तथा शरीर पर रोएं हो जाते है | इल्ली की तीसरी अवस्था लगभग 20 – 25 मि.मी. लम्बी होती है जो की इधर उधर घूम कर अधिक नुकसान करती है पूर्ण विकसित इल्लियाँ 40 – 45 मि.मी. तक लम्बी होती है तथा भूरे लाल रंग की एवं बड़े रोए वाली होती है | पूर्ण विकसित इल्लियाँ अपने शरीर के बालों को लार से मिलाकर कोय (भांखी कवच) बनती है | भांखी गहरे भरे रंग की होती है |

प्रकोप : नवजात इल्लियाँ अण्ड – गुच्छों से निकलकर एक ही पत्ती पर ही झुण्ड में रहकर पर्ण हरित खुरच कर खाती है | नवजात इल्लियाँ 5 – 7 दिनों तक झुण्ड में रहने के पश्चात् पहले उसी पौधे पर्येवाम बाद में अन्य पोधों पर फेल कर पूर्ण पत्तियाँ खाती है | जिससे पत्तियाँ पूर्णत: पर्ण हरित विहीन जालीनुमा हो जाती है | इल्लियों द्वारा खाने पर बनी जालीनुमा पत्तियों को दूर से ही देख कर पहचाना जा सकता है |

जीवन चक्र : मादा शलभ अपने जीवन काल में 3 – 5 अण्ड गुच्छों में 500 से 1300 अण्डे पत्तियों की निचली सतह पर देती है |अण्डकाल 3 से 15 दिनों का होता है | शंखी से 9 – 15 दिनों में शलभ निकलती है | कीट 35 – 42 दिनों में एक जीवन चक्र पूर्ण करता है | कीट की साल भर में 8 पीढ़ियां होती है |

पोषक पौधे : मूंग, उड़द, सूर्यमुखी, अलसी, तिल, अरण्डी, पत्तागोभी आदि |

आर्थिक क्षति स्तर : 10 इल्लियाँ / मीटर कतार |

नियंत्रण : इल्ली के प्रारंभिक अवस्था के झुंड को इक्कठा कर नष्ट कर दें | आर्थिक क्षति स्तर से अधिक कीट प्रकोप होने पर कीटनाशक दवाई का छिड़काव करे |

सोयाबीन का फसल छेदक (हेलिकोवरपा आमीर्जेरा)

पहचान : वयस्क शलभ मटमैला भूरा या हल्के कत्थाई रंग की जिसके अगले पंखों पर बादामी रंग की आड़ी – तिरछी रेखायें होती है | जबकि पिछले पंख रंग में सफेद तथा बहरी किनारों पर चौड़े काले (यकृति जैसे) धब्बे होते है | वयस्क शलभ दिन में पत्तियों में छिपी रहती है तथा रात में फसल पर भ्रमक करती है |  अण्डे गोलाकार तथा चमकदार हरे – सफेद रंग के होते हैं अण्डों की सतह पर तिरछी धारियाँ पायी जाती है | अण्डे शुरू में चमकिले हरे – सफेद रंग के होते हैं जो इल्लियों के निकलने के एक दिन पहले काले हो जाते है | नवजात इल्लियाँ हरे रंग की होती है | पूर्ण विकसित इल्ली करीब 3.5 – 4 मि.मी. लम्बी होती है जिनके शरीर के बगल में गहरे पीले रंग की टूटी धारी होती है | सर हल्का भूरा होता है इल्ली का रंग अलग – अलग होता है |

प्रकोप : नवजात इल्लियाँ कली, फूल एवं फल्लियों को खाकर नष्ट करती है पर फल्लियों में दाने पड़ने के पश्चात इल्लियाँ फलली में छेद कर दाने खाकर आर्थिक रूप से हानी पहुँचती है | फलली के समय 3 – 6 इल्लियां प्रति मीटर होने पर सोयाबीन की पैदावार में 15 -90 प्रतिशत तक हानी होती है |

जीवन चक्र : मादा शलभ रात्री में पत्तियों की निचली सतह पर एक एक कर 1200 से 1500 तकअण्डे देती है | अण्डाकाल 3 – 4 एवं इल्ली – काल 20 – 25 दिनों का होता है | पूर्ण विकसित इल्ली भूमि में गहराई में जाकर मिटटी में शंखी में परिवर्तित हो जाती है | शंख में परिवर्तित हो जाती है | शंखी कल 9 – 13 दिनों का होता है | कीट अपना एक जीवन चक्र 31 – 35 दिनों में पूर्ण करता है |

पोषक पौधे : कपास, चना, मटर, अरहर, तम्बाकू, टमाटर, अन्य सब्जियाँ एवं जंगली पौधे

नियंत्रण: ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई कर इल्ली व शंखी को इक्कठा कर नष्ट करें (चने के इल्ली हेतु) फसल में 50 अंग्रेजी के टी (T) अथवा दोफनी आकर की खूंटियां (3 – 5 फीट ऊँची) पक्षियों के बैठने हेतु फसल की शुरआत से ही लगाये | जिन पर पक्षी बैठ कर इल्लियाँ खा सके | कीट दिखाई देने पर 12 फिरोमोन ट्रेप/ हे. के हिसाब से लगा दें |

रसायनिक नियंत्रण पत्ती खाने वाली एवं फली छेदक इल्लियों के लिए : अदि आर्तिक क्षति स्तर से अधिक नुकसान होता है , तो कीटनाशक दवाई का उपयोग करें |अचयनित दवाओं का उपयोग न करें | कीट बृद्धि नियंत्रण (आई.जी.आर.) जैसे डायलूबेंजुरान 25 डब्लू.पी. 350 ग्राम/ हे. या नोवेल्युरान 10 ई.सी. 375मि.ली.या लेफेयुरान 10 ई.सी. 500 मि.ली./ हे. अथवा जैविक कीट नाभाक, एन.पी.व्ही. 250 एल.ई./हे. अथवा डायपेल, वायोबिट या हाल्ट 1 किलो ग्राम / हे. या बयोरिन या लावोसेल 1 किलोग्राम/ हे. अथवा रासायनिक कीट नाभाक जैसे क्लोरापेरिफास 20 ई.सी. 1.5 ली. अ प्रोफेनोफाम 50 ई.सी. 1.2 ली. अ रायनेक्सीपार 10 एस.पी.100 मि.ली. या इमामेकिटन बेंजोएट 5 एस.जी. 180 ग्राम या मिथोमिल 40 एस.जी. 1000 मि.ली. या प्रोफेनेफास 500 ई. सी. 1.25 ली. अ लेम्बड़ा सायलोहेर्थिन 5 ई.सी. 300 मि.ली. या इनडोक्सकर्ब 14.8एस.एल. 300 मि.ली./ हे. के हिसाब से उपयोग करें | चूर्ण जैसे फैनवेलरेट 0.4 प्रतिशत 25 किलोग्राम/हे. के हिसाब से उपयोग करें |

रस चूषक कीट

पहचान : वयस्क कीट लगभग 1 मि.मी. लम्बा होता है | जिसके पंख सफेद – पीले रंग के होते है, जो मोमयुक्त पर्तदार पंखो वाली मक्खी होती है | अण्डे करीब 0.2 मि.मी. लम्बे, नाशपाती आकार के होते है, शंखी कलि नाशपाती आकार की होती है | अण्डो का रंग सफेद होता है | लेकिन निकलने के पहले ये भूरे या काले रंग के हो जाते है | निम्फ (भिभा) नाभापाती आकार के हलके पीले रंग के होते है | दूसरी एवं चौथी अवस्था में यह चल नही सकते है |

प्रकोप का तरीका : इसका प्रकोप पौधे के एक पत्ती अवस्था से ही प्रारंभ हो जाता है | जो की फसल की हरी अवस्था तक प्रकोप करता रहता है | शिशुयेवाम वयस्क पौधे से रस चूसते हैं | यह पीला विषाणु रोग फैलता है, जो कि फसल की मुख्य समस्या है |

जीवन चक्र : मादा मक्खी अपने जीवनकाल में 40 – 100 तक अण्डे देती है | जिसके रंग पीला एवं पत्तियों के निचली सतह पर देती है | शिशु अवस्था 7 – 14 दिनों की होती है वयस्क 8 – 14 दिनों में निकलते हैं | कीट का एक जीवन चक्र 13 – 62 दिनों तक होता है |

नियंत्रण : पीला विषाणु रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला दें | बोनी के पहले बीज को थायोमेथाकसम 70 डब्लू.एस. 3 ग्राम/किलोग्राम या इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. 5 मि.ली./किलोग्राम की दर से बीजोपचार कर बोनी करें | फसल पर कीट का आक्रमण होने पर निम्नलिखित कोई एक कीट नाभाक दवा का छिड़काव करें | ट्रायाजोफांस 40 ई.सी. 800 – 1000 एम.एल. या थायमेथेक्जेम 25 डब्ल्यू.जी. 100 ग्राम या इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. 200 मि.ली. या मेथाइल डेमेटान 25 ई.सी. 800मि.ली./हे. |

लाल मकड़ी (टेट्रानिक्स टेलारीयस)

पहचान : माइट या मकड़ी के वयस्क अंडाकार आकार के लाल या हरे रंग के 0.4 से 0.5 मि.मी. लम्बे बालों वाले एवं आठ टांगो वाले होते है | प्रथम अवस्था में 3 जोड़ी पैर होते है तथा रंग गुलाबी होता है | दिवतीय तथा तृतीय अवस्था में 4 जोड़ी पैर होते है | सभी अवस्था येपत्तीओं की निचली सतह पर सफेद महीन पारदशी झिल्ली के निचे पाई जाती है | अण्डे आकार में गोले,सफेद रंग तथा 0.1 मि.मी. की गोलाई लिये होते है |

प्रकोप : इसका प्रकोप सोया बीन फसल पर सामान्यत सितम्बर से अक्टूबर माह में विभोष कर कम वर्षा की स्थिति में ज्यादातर देखने को मिलता है | वयस्क तथा शिशु दोनों अवस्थाएं पौधों के तना, शाखा, फ्ल्लियां तथा पत्तियों का रस चूसकर हानी पहुंचाते है | प्रकोपित भागों पर पतली, सफेद एवं पारदर्शी झिल्ली पड़ी होती है | रस चूसने के कारण पत्तियों पर सफेद – क्त्थाई धब्बे बनतें है तथा पत्तियां प्रकोप के कारण मुरझा जाती है | प्रकोपित पौधों की ऊपज में 15 प्रतिशत तक कमी होती है | ग्रसित पौधे के दाने सिकुड़ जाते है तथा उनकी अंकुरण क्षमता अत्यधिक प्रभावित होती है |

जीवन चक्र : मादा अलग – अलग करके पत्ती के निचले सतह पर लगभग 60 – 65 अण्डे देती है | 4 – 7 दिनों में अण्डों से शिशु निकलते है | और पौधों का रस चूसने लगते है | 6 – 10 दिनों के बाद शिशु से वयस्क बनते है | शिशु और वयस्क  एक महीन पारदर्शक जले से ढकी रहती है |

पोषक पौधे : मूंग, उड़द, टमाटर, भिन्डी, कपास आदि |

नियंत्रण : खड़ी फसल पर अत्याधिक प्रकोप होने पर ही निम्नलिखित कोई एक कीट नाभाक जैसे इथियान 50% ई.सी. 1.5 ली. या प्रोफेनोफास 50% ई.सी., या ट्रायाजोफांस 40 ई.सी. 800 मि.ली. या डायाफेनिथायूरान 50 डब्ल्यू.पी. 500 ग्राम प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें |

सफेद सुण्डी (व्हाइट ग्रब) (होलोट्रोकिया कानसेगूंनिया)

पहचान : भृंग का आकार में 7 मि.मी. चौड़ा तथा 18 मि.मी. लम्बा होता है | वयस्क भृंग नवविकसित अवस्था में पीले रंग का जो बाद में चमकदार तांबे जैसा हो जाता है | इल्ली या ग्रब (लट) अवस्था का रंग सफेद होता है | पूर्ण विकसित इल्ली का शरीर मोटा, रंग मटमैला – सफेद तथा आकार अंग्रेजी के “सी” अक्षर के समान मुदा होता है | जिनका सिर गहरे भरे रंग का तथा मुखांग मजबूत होता है |

प्रकोप का तरीका : कीट के लट(इल्ली) एवं वयस्क दोनों अवस्था हानि पहुँचती है पर इल्ली अवस्था में फसलों को ज्यादा नुकसान पहुँचती है | वयस्क भृंग विभिन्न पौधों एवं कुछ झाड़ीनुमा वृक्षों की पत्तियाँ खाते है जबकि अण्डों से निकली नवजात इल्लियाँ शुरू में भूमि के अंदर पौधों की छोटी – छोटी जड़ों को खाती है तथा बड़ी होने पर मुख्य जड़ो को तेजी से काटती है | परिणामस्वरूप प्रकोपित पौधे पहले मुरझाते है फिर सुख कर नष्ट हो जाते है | जिससे खेतों में जगह – जगह घेरे बन जाते है | इल्ली एवं शंखी भूमि में पाई जाती है |

जीवन चक्र : व्यस्क भृंग वर्षा ऋतू की शुरुआत में jun – जुलाई में भारी वर्षा होने पर अपनी सुसुप्तावस्था तोड़कर भूमि से बाहर एक साथ काफी संख्या में निकलते है | मद कीट भूरभूरी और नमी युक्त मृदा में 1 से 6 इंच की गहराई में पौधे के पास अण्डे देती है | अण्डे लगभग 30 – 50 दिन में उचित तापमान होने पर फूटते है | इल्ली (कोया) बनाकर भूमि के ऊपरी सतह पर सुसुप्तावस्था में रहते है | कीट वर्ष में अपना एक जीवन चक्र पूर्ण करता है |

कृषिगत नियंत्रण : गर्मी में खेतों की गहरी जुताई एवं सफाई कर कीट की सुसुप्तावस्था तोड़ दें |

यांत्रिक नियंत्रण : प्रकाश प्रपंच की सहायता से प्रौढ़ कीट को इक्कठा कर नष्ट कर दें |

जैविक नियंत्रण :बेबोरीया बेसीयाना और मेटारहिजीयम एनिसोपली 5 किलो ग्राम को गोबर की खाद या केचुए की खाद (2.5 कि.) के साथ मिश्रित कर खेत में फैला दें |

रासायनिक नियंत्रण : भूमि में फोरेट 10 जी 25 किलो ग्राम / हे. के हिसाब से बुवाई के समय खेत मिला दें

पौधे रोग

फफूंद द्वारा होने वाले रोग

एरियल ब्लाइट

रोगजनक : राइजोकटोनिया सोलेनाई

लक्षण:

  1. इस बीमारी के लक्षण सर्वप्रथम घनी बोयी गयी फसल में, पौधे के निचले हिस्सों दिखाई देते है |
  2. रोगग्रस्त पौधे पर्णदाग, पत्ती झुलसन अथवा पत्तियों का गिरना आदि लक्षण प्रदर्शित करते है | (चित्र क्र. 1अ, ब.)
  3. पर्णदाग असामान्य पनीले धब्बों के रूप में दिखाई देते है, जो की बाद में भूरे या काले रंग में परिवर्तित हो जाते है एवं संपूर्ण पत्ती झुलस जाती है |
  4. अधिक नमी की उपस्थिति में पत्तियां येसे प्रतीत होते है जैसे पानी में उबली गई हो | (चित्र क्र.- 1 स)
  5. पर्णवृंत, तना फली पर भी भूरे धब्बे दिखाई देते है |
  6. फली एवं तानों के ऊतक संक्रमण पश्चात भूरे अथवा काले रंग के होकर सिकुड़ जाते है |
  7. पौधों के रोगग्रस्त भागों पर नमी की उपस्थिति में सफेद और भूरे रंग की संरचनाए (स्क्लेरोशिया) दिखाई देती है (चित्र क्र. – 1 द)

अनुकूल परिस्थितियाँ

पुष्पनकाल के दौरान लंबे समय तक अधिक नमी एवं काम तापमान रहना, पास – पास बोयी गयी फसल, पौधों के जमीं पर गिर जाने पर, लगातार वर्षा की अवस्था तथा खराब जल निकास होना संक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं |

प्रबंधन :

  1. गर्मी में गहरी जुताई करें |
  2. बीज उपचार द्वारा फसल को प्रारंभिक में रोगग्रस्त होने से बचाया जा सकता है |बीज उपचार थायरम + काब्रेंन्डाजिम (2:1) 2.5 – 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से करें |
  3. जल निकास अच्छा रखें |
  4. फसल की बुवाई अनुशंसित दुरी पर करें तथा ध्यान रहे खेत में पौध संख्या भी अत्यधिक नही होना चाहिये |
  5. पर्णीय छिड़काव के रूप में काब्रेंन्डाजिम का उपयोग 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बुवाई के 45 से 60 दिन पर करें |

 

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धान में जीवाणुज पत्ती अंगमारी रोग एवं रोकथाम

8 September 2018 - 6:31pm

जीवाणुज पत्ती अंगमारी रोग या जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग जीवाणुज पर्ण झुलसा रोग लगभग पूरे विश्व के लिए एक परेशानी है। भारत मे मुख्यत: यह रोग धान विकसित प्रदेशाें जैसे- पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, छत्तीशगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटका, तमिलनाडु मे फैली हुई है। इसके अलावे अन्य कई प्रदेशों मे भी यह रोग देखी गई है। भारत वर्ष मे यह रोग सबसे गंभीर समस्या बन गया है। यह रोग बिहार मे भी बड़ी तेजी से फैल रहा है।

जीवाणुज पत्ता अंगमारी के लक्षण

 

यह रोग जैन्थोमोनास ओराइजी पी.वी. ओराइजी नामक जीवाणु से होता है। मुख्य रूप से यह पत्तियों का रोग है। रोपार्इ के 1से 6सप्ताह के बीच रोगग्रस्त पौधों की शुरू में गौभ सूखने लगती है तथा पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं। बाद में रोगी पौधे मर जाते हैं तथा इनके तनों को काटकर दबाने से पीला-सफेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है  यह रोग कुल दो अवस्थाओं मे होता है, पर्ण झुलसा अवस्था एवं क्रेसेक अवस्था।

सर्वप्रथम पत्तियों के ऊपरी सिरे पर हरे-पीले जलधारित धब्बों के रूप मे रोग उभरता है। पत्तियों पर पीली या पुआल के रंग कबी लहरदार धारियाँ एक या दोनो किनारों के सिरे से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ती है और पत्तियाँ सूख जाती हैं। ये धब्बें पत्तियों के किनारे के समानान्तर धारी के रूप मे बढ़ते हैं। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पुआल के रंग मे बदल जाती है। ये धारियां शिराओं से धिरी रहती है, और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती है। मोती की तरह छोटे-छोटे पीले से कहरूवा रंग के जीवाणु पदार्थ धारियों पर पाये जाते है, जिससे पत्तियाँ समय से पहले सूख जाती है। रोग की सबसे हानिकारक अवस्था म्लानि या क्रेसक है, जिससे पूरा पौधा सूख जाता है।

 

रोगी पत्तियों को काट कर शीशे के ग्लास मे डालने पर पानी दुधिया रंग का हो जाता है।  जीवाणु झुलसा के लक्षण धान के पौधे मे दो अवस्थाओं मे दिखाई पड़ते है।

म्लानी अवस्था (करेसेक) एवं पर्ण झुलसा (लीफ ब्लास्ट) जिसमें पर्ण झुलसा अधिक व्यापक है।

झुलसा अवस्था

पत्ती की सतह पर जलसिक्त क्षत बन जाते है, और इनकी शुरूआत पत्तियों के ऊपरी सिरों से होती है। बाद मे ये क्षत हल्के पीले या पुआल के रंग के हो जाते हैं, और लहरदार किनारें सहित नीचे की ओर इनका प्रसार होता है। ये क्षत उत्तिक्षयी होकर बाद मे तेजी से सूख जाते है।

 

म्लानी या क्रेसेक अवस्था

 

रोग की यह अवस्था दौजियाँ बनना आरम्भ होने के दौरान नर्सरी मे दिखाई पड़ती है। पीतिमा एवं अचानक म्लानी इसके सामान्य लक्षण है। म्लानि वस्तुत: लक्षण की दूसरी अवस्था है।

ये लक्षण रोपाई के 3-4 सप्ताह के अन्दर प्रकट होने लगते है। इस अवस्था मे ग्रसित पौधो की पत्तियाँ लम्बाई मे अन्दर की ओर सिकुड़कर मुड़ जाती है। जिसके फलस्वरूप पूरी पत्ती मुरझा जाती है, जो बाद मे सूख कर मर जाती है। कभी-कभी क्षतस्थल पत्तियों के बीच या मध्य शिरा के साथ-साथ पाये जाते है। ग्रसित भाग से जीवाणु युक्त श्राव बूंदों के रूप मे निकलता है। ये श्राव सूखकर कठोर हो जाते है। और हल्के पीले से नारंगी रंग की कणिकाएॅ। अथवा पपड़ी के रूप मे दिखाई देता है। आक्रांत भाग से जीवाणु का रिसाव होता है। यदि खेत मे पानी का जमाव हो तो धान की फसल से दूर से बदबू आती है। पर्णच्छद भी संक्रमित होता है, जिस पर लक्षण पत्तियों के समान ही होते है। रोग के उग्र अवस्था मे ग्रस्त पौधे पूर्ण रूप से मर जाते है।

 

रोग नियंत्रण

 

एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 5 ग्राम एग्रीमाइसीन 100 को 45 लीटर पानी घोल कर बीज को बोने से पहले 12 घंटे तक डुबो लें। बुआई से पूर्व 0.05 प्रतिशत सेरेसान एवं 0.025 प्रतिशत स्ट्रेप्टोसाईक्लिन के घोल से उपचारित कर लगावें। बीजो को स्थूडोमोनास फ्लोरेसेन्स 10 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर लगावें। खड़ी फसल मे रोग दिखने पर ब्लाइटाक्स-50 की 2.5 किलोग्राम एवं स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 50 ग्राम दवा 80-100 लीटर पानी मे मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। खड़ी फसल मे एग्रीमाइसीन 100 का 75 ग्राम और काँपर आक्सीक्लोराइड (ब्लाइटाक्स) का 500 ग्राम 500 लीटर पानी मे घोलकार प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। संतुलित उर्वरको का प्रयोग करे, लक्षण प्रकट होने पर नेत्रजन युक्त खाद का छिड़काव नही करना चाहिए। धान रोपने के समय पौधे के बीज की दूरी 10-15 से.मी. अवश्य रखें। खेत से समय-समय पर पानी निकालते रहें तथा नाइट्रोजन का प्रयोग ज्यादा न करें। आक्रांत खेतों का पानी एक से दूसरें खेत मे न जाने दें।

रोकथाम

प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें ।

बोने से पहले बीज का उपचार करें। 

अगेती व घिनकी रोपार्इ न करें तथा नत्रजन खाद का अधिक प्रयोग नकरें। खाद का प्रयोग संतुलित मात्रा में करें।

 रोगग्रस्त खेत का पानी रोगरहित खेत में न जाने दें।

स्वस्थ प्रमाणित बीजों का व्यवहार करें।

रोग रोधी किस्मों जैसे- आई. आर.-20, मंसूरी, प्रसाद, रामकृष्णा, रत्ना, साकेत-4, राजश्री और सत्यम आदि का चयन करें।

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नीम: एक अच्छा कार्बनिक उर्वरक

23 August 2018 - 6:53pm

मैं खाद के बारे में पहले भी चर्चा की है. अब अपने समय कुछ उपलब्ध जैविक उर्वरकों पर कुछ प्रकाश डाल करने के लिए. आज के संस्करण नीम है.
वानस्पतिक नाम: Azadirachta इंडिका
आम नाम: निम, नीम, लिंबा, और निम्बा आदि
नीम मोटा और नहीं बल्कि कम स्टेम साथ एक पेड़ है. यह 12-15 मीटर तक बढ़ सकता है. नीम के बीज पेड़ से और तेल निकाला जाता है वहाँ से एकत्र कर रहे हैं. डी तेल से सना हुआ नीम केक मिट्टी के निषेचन में उपयोग किया जाता है.
नीम के कई उपयोग हैं. यह विभिन्न उपभोक्ता और औद्योगिक उत्पादों की तैयारी के लिए एक आधार के रूप में प्रयोग किया जाता है. यह कीट के लिए एक से बचाने वाली क्रीम के रूप में प्रयोग किया जाता है. रासायनिक कीटनाशकों के विपरीत नीम बल्कि नर्वस या पाचन तंत्र पर काम करने से किसी भी कीट का हार्मोनल सिस्टम पर काम करता है और इसलिए यह प्रतिरोध करने के लिए नेतृत्व नहीं करता है. भारत में नीम के पौधे एक हवा शुद्ध माना जाता है और इसलिए पिछवाड़े में या घर के बगल में लगाया. लेकिन इस लेख में मैं यह एक उर्वरक के रूप में है ही प्रभाव पर चर्चा करेंगे.

 

बहुत जल्दी भारत नीम में चूंकि एक प्राकृतिक उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. यह वजह से अपनी दोहरी मिट्टी बढ़ाने के प्रभाव के साथ ही कीट से बचाने वाली क्रीम के लिए बहुत लोकप्रिय हो गया था. नीम केक के साथ ही नीम के पत्ते मिट्टी उपजाऊ बनाना करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. followings के नीम के बीज केक के पोषक तत्व होते हैं:
पोषक तत्वों का प्रतिशत
 नाइट्रोजन              (2.0%% 5.0)

 फॉस्फोरस                (0.5%% 1.0)

  पोटैशियम                  (1.0%% 2.0)

( कैल्शियम            (0.5%% 3.0 के लिए)

(Zn)जस्ता    (15 पीपीएम पीपीएम से 60घन)

तांबा    (4 पीपीएम पीपीएम से 20)

सल्फर (0.2%% 3.0 के लिए)

मैगनीशियम  (0.3%% 1.0)

लोहा (500 पीपीएम 1200 पीपीएम)

मैंगनीज़(20 पीपीएम पीपीएम से 60)

 

आप अपनी मिट्टी पीएच कम हो रही विचार कर रहे हैं नीम एक महान उत्पाद हो सकता है. यह मिट्टी के साथ मिश्रित मिल और कार्बनिक अम्ल उत्पादन के रूप में यह मिट्टी की क्षारीयता को कम कर सकते हैं. भारत में यह बड़े पैमाने पर यह बढ़ फूल और सब्जियों में रासायनिक उर्वरकों के लिए एक अच्छा विकल्प है हल्दी, गन्ना, केला आदि जैसी नकदी फसलों में प्रयोग किया जाता है.
नीम केक फलों और सब्जियों के दिखावे में सुधार. यह भी जड़ों को मजबूत है, और पत्ते हो जाना. खाद या अन्य जैविक खाद के साथ मिश्रित जब यह बहुत अच्छी तरह से काम करता है. नाइट्रोजन उर्वरकों के साथ नीम लागू करने से अमोनिया, नाइट्रेट और नाइट्राइट में नाइट्रोजन यौगिकों के रूपांतरण की प्रक्रिया को धीमा कर और इसलिए मिट्टी की दक्षता में सुधार कर सकते हैं.
नीम केक हालांकि विभिन्न पोषक तत्वों (एनपीके और सूक्ष्म पोषक तत्वों) से समृद्ध है और इसे प्रभावी बहुत लागत है यूरिया की तुलना में बेहतर उपज का उत्पादन कर रहे हैं. एनपीके 100% प्राकृतिक है और (जैसा कि ऊपर कहा) यह भी कई सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ है. वे मिट्टी में उपस्थित रोगाणुओं के साथ बहुत अच्छी तरह से संगत कर रहे हैं और अपनी प्रजनन क्षमता में सुधार. पृथ्वी कीड़े की तरह लाभकारी जानवरों वास्तव में नीम की तरह लगता है

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क्या किसानों की आय दुगनी होगी?

19 August 2018 - 2:31pm

क्या किसानों की आय दुगनी होगी?

 दावे के अनुसार किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करना कठिन लक्ष्य है.महंगाई को समायोजित करने के बाद देश के किसानों की आय 2003 से 2013 के बीच एक दशक में सालाना पांच फीसदी की दर से बढ़ी. इसे देखते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अगले पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने की घोषणा पर संदेह होता है.

कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइसेज के पूर्व अध्यक्ष और इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनॉमिक्स रिलेशंस के प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए एक आलेख में लिखा है कि पांच साल में आय दूनी करने का मतलब है कि हर साल आय में 12 फीसदी वृद्धि होनी चाहिए.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की सिचुएशनल एसेसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल हाउसहोल्ड्स रिपोर्ट के मुताबिक खेती और पुशपालन से किसानों की औसत मासिक आय 2003 में 1,060 रुपये थी, जो 2013 में बढ़कर 3,844 रुपये हो गई, जो सालाना 13.7 फीसदी की चक्रवृद्धि दर है.

एक विश्लेषण के मुताबिक यदि महंगाई के असर को ध्यान में रखे बिना पांच साल में किसानों की आय दूनी करनी हो, तो सालाना 15 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से आय बढ़ानी होगी. इसलिए सरकार को किसानों की आय 13.7 फीसदी की जगह 15 फीसदी की दर से वृद्धि को सुनिश्चित करना होगा.

इसमें हालांकि कई बाधाएं हैं : बीज, ऊर्वरक जैसी कई सामग्रियों की कीमत में वृद्धि, न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रसार में कम रहना, गोदाम और शीत भंडारण जैसी अवसंरचना सुविधाओं की कमी और 85 फीसदी किसानों का बीमा सुरक्षा के दायरे में नहीं होना.

15 फीसदी की वृद्धि दर के बाद भी यदि महंगाई के असर को ध्यान में रखा जाए, तो 2022 में किसानों की आय 2016 जितनी ही होगी.

2003 की तुलना में कृषि आय में यद्यपि 3.6 गुने की वृद्धि हुई, लेकिन इसी बीच लागत भी तीन गुना बढ़ी.

जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात है, तो एक अनुमान के मुताबिक 25 फीसदी किसानों को ही इसकी जानकारी होती है. कुल फसलों में तो पांच फीसदी किसान ही इसके बारे में जानते हैं.

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक नियामकीय बाधाओं के कारण कृषि बाजार में निवेश नहीं हो पा रहा है और इसके कारण किसान घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक नहीं हो पा रहे हैं. कृषि उपज और विपणन कमेटी के तहत अलग-अलग राज्यों के कई करों के कारण किसानों को कम बिचौलियों को अधिक लाभ हो रहा है.

2014-15 में सरकार द्वारा घोषित फसल बीमा योजना से सिर्फ 15 फीसदी किसानों को ही लाभ मिला है. सरकार ने यद्यपि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मौजूदा बीमा योजनाओं को मिला दिया है और किसानों के लिए प्रीमियम का बोझ घटा दिया है और बीमा पर सरकारी सब्सिडी की सीमा हटा दी है.

अशोक गुलाटी ने अपने शोध पत्र में लिखा है, “चीन ने 1978 में कृषि क्षेत्र में सुधार शुरू किया और 1978 से 87 के बीच कृषि सकल घरेलू उत्पाद सालाना सात फीसदी की दर से बढ़ी, जबकि कीमतों को नियंत्रणमुक्त करने से किसानों की आय इस दौरान सालाना 14 फीसदी चक्रवृद्धि दर से बढ़ी. इसके कारण सिर्फ छह साल में गरीबी आधी घट गई.”

भारत में कृषि जीडीपी वृद्धि दर 2015-16 में सिर्फ एक फीसदी (अग्रिम अनुमान) रही है, इसलिए सरकार के लिए किसानों की आय हर साल 14 फीसदी चक्रवृद्धि दर से बढ़ा पाना एक दुसाध्य काम होगा.

किसान हितैषी और समस्त विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत थे अटल जी : डॉ आर के सिंह

17 August 2018 - 11:10am

अटल जी एक नेता ही नहीं बल्कि समाज सुधारक, कुशल प्रशासक, कुशल वक्ता तथा सम्पूर्ण विश्व के नेता थे।उन्होंने जीवन के किसी भी पड़ाव पर हार नहीं मानी ।
अपने बचपन के समय में ही मैने अटल जी की सभाओं में उन्हें सुना था, उनसे मुलाकात की थी, उस समय मेरी आयु 12 वर्ष की थी जब अटल जी से मुलाकात की थी मैंने जैसे ही उन्हें चरण स्पर्श किये उन्होंने मुझे गले लगा कर कहा कि आप आगामी नेता हो देश को आपकी जरूरत है आगे बढ़ कर देश को संभालने का काम करो ।उस समय मेरी समझ में कुछ नहीं आया था।उसके कुछ समय बाद ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई। कुछ सालों के बाद अटल जी के नेतृत्व मे भाजपा ने सरकार बनाई।
किसानों के लिए हमेशा से ही संवेदनशील रहे अटल बिहारी वाजपेयी देश के किसान वर्ग पर खास नजर रखते थे।किसान फसली ऋण का ब्याज पहली बार 18 से 9 फीसद करने का उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा। किसानों के लिए क्रेडिट कार्ड भी उन्होंने शुरू किया। देश का किसान उनको किसान क्रेडिट कार्ड देने वाले प्रधानमंत्री के रूप मे सदैव याद रखेगा। वर्तमान फसल बीमा के विचार उनके युग में शुरू हुआ।
किसानों की ताकत बढ़ाने के लिए ,विज्ञान की शक्ति को बढ़ावा देने के लिए वाजपेयी जी ने लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान जय किसान' में बदलाव किया और 'जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान' का नारा दिया।

गाँव की सडक़ों के लिये पैसे देने वाले वो भारत के पहले प्रधानमंत्री थे।

अटल जी की कविता जो सदैव मुझे प्रेरणा देती है

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
डॉ आर के सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष
किसान हैल्प

कहां खो गई हम किसानों की स्वाधीनता

14 August 2018 - 8:00pm

वैश्विक तापवृद्धि, जलवायु परिवर्तन, कुदरती आपदाओं में इजाफा और बढ़ती लागत के चलते खेती पहले से ही घाटे का सौदा है। लेकिन, अब मुक्त व्यापार नीतियों के तहत सस्ते कृषि उत्पादों का बढ़ता आयात किसानों को गहरे संकट में डाल रहा है। इससे न केवल बढ़ती आबादी के अनुरूप खाद्यान्न उत्पादन में बढोतरी की रफ्तार धीमी पड़ गई है। बल्कि, सरकारी कोशिशों के बावजूद किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत नहीं मिल पा रही है। इसका सीधा असर प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता और किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। गौरतलब है कि देश 70 वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। जिस उदारीकरण की नीतियों को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान माना गया, वही अब किसानों को कंगाली के बाड़े में धकेल रही है। यह समस्या इसलिए भी गंभीर होती जा रही है। क्योंकि, भूमंडलीकरण के दौर में सरकार ने कृषि व्यापार का उदारीकरण तो कर दिया। लेकिन, भारतीय किसानों को वह सुविधाएं नहीं मिलीं कि वह विश्व बाजार में अपनी उपज बेच सकें।

दूसरी ओर, विकसित देशों की सरकारें और कृषि जन्य कारोबारी कंपनियां हर प्रकार के तिकड़म अपनाकर देश के विशाल बाजार में अपनी पैठ बढाती जा रही हैं। बंपर फसल के बावजूद किसानों को उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलने की एक बड़ी वजह सस्ता आयात भी है। भारत में खाद्य तेल और दालों का आयात तो लंबे अरसे से हो रहा है । लेकिन , अब गेहूं, मक्का और गैर बासमती चावल का भी आयात होने लगा है। पिछले तीन वर्षों में इन अनाजों का आयात 110 गुना बढ गया जो कि चिंता का कारण बनता जा रहा है। उदाहरण के लिए, 2014-15 में जहां 134 करोड रुपए का गेहूं, मक्का और गैर बासमती चावल का आयात किया गया था । वहीं, तीन साल बाद 2016-17 में यह आंकडा बढ़कर 9009 करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान फलों और सब्जियों का आयात भी तेजी से बढ़ा है। अब तो बागवानी उपजों का भी आयात होने लगा है। उदाहरण के लिए श्रीलंका से हुए मुक्त व्यापार समझौते की आड़ में वहां की सस्ती स्थानीय और वियतनाम से आयातित काली मिर्च भारत में धडल्ले से आ रही है, जिससे भारतीय कालीमिर्च के किसानों को लागत निकालना कठिन हो गया है। समस्या यह है कि एक ओर कृषि उपजों का आयात बढ़ रहा है तो दूसरी ओर देश से होने वाले कृषिगत निर्यात में कमी आने लगी है। उदाहरण के लिए 2014-15 में 1.31 लाख करोड़ रुपए का निर्यात हुआ तो 2015-16 में 1.08 लाख करोड़ रुपए रह गया। कृषि उपज के बढ़ते आयात की एक बड़ी वजह यह है कि हमारे यहां सरकारें जितनी चिंता महंगाई की करती हैं उसका दसवां हिस्सा भी किसानों के आमदनी की नहीं करतीं। यही कारण है कि बाजार की कीमतों में तनिक सी बढ़ोतरी होते ही सरकार के माथे पर बल पडऩे लगता है और वह तुरंत आयात शुल्क में कटौती कर देती है। इस सस्ते आयात का सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। इसे गेहूं के उदाहरण से समझा जा सकता है। 2015-16 में गेहूं उत्पादन के बंपर अग्रिम अनुमान को देखते हुए सरकार ने गेहूं खरीद का लक्ष्य तीन करोड़ टन रखा। लेकिन, वास्तविक खरीद 230 लाख टन ही हो पाई। ऐसे में बाजार में गेहूं की कीमतें चढऩी शुरू हो गर्इं। इससे चिंतित सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क 25 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया।

इसके बाद भी कीमतों में बढ़ौत्तरी नहीं थमी तो दिसंबर 2016 में सरकार ने गेहूं पर लगने वाले आयात शुल्क को पूरी तरह हटा लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि आयातक एजेंसियां और दक्षिण भारतीय आटा मिलें गेहूं का आयात करने लगीं और मार्च 2017 तक 35 लाख टन गेहूं आयात के अनुबंध हो गए। घरेलू किसानों के बढ़ते दबाव और 2017 में गेहूं की बढिय़ा फसल को देखते हुए सरकार ने मार्च 2017 में गेहूं पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगाया। इसके बावजूद गेहूं का आयात जारी है। गेहूं की कहानी दालों के साथ दुहराई गई। दालों की महंगाई से परेशान सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भरपूर बढ़ौत्तरी की। इसका परिणाम यह हुआ कि 2016-17 में दालों का उत्पादन 260 लाख टन हो गया। लेकिन, इस दौरान 57 लाख टन आयात के कारण घरेलू बाजार में दालों की प्रचुरता हो गई, जिससे किसानों को एमएसपी से भी कम कीमत पर दाल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने के लिए दूरगामी उपाय कर रही है। पिछले तीन वर्षों के दौरान कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए शुरू की गई योजनाएं इसका प्रमाण हैं, जैसे राष्ट्रीय कृषि बाजार, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, यूरिया पर नीम का लेपन, जैविक खेती और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। लेकिन, विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों के अनुरूप जिस ढंग से कृषि उपजों का आयात बढ़ रहा है उससे न केवल खेती-किसानी बदहाली की ओर जा रही है बल्कि, देश की खाद्य संप्रभुता भी खतरे में पड़ जाने की आशंका व्यक्तकी जाने लगी है। आखिर भारत, पनामा, कुवैत जैसा छोटा-मोटा देश तो है नहीं, जो आयातित खाद्यान्न के बल अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर ले। स्पष्ट है कि अगर हम सस्ते कृषि उपज के बढ़ते आयात पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हुए तो सस्ता आयात हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।

हमे बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया इन रासायनिक खादों ने :गिरिजा कान्त सिंह

11 July 2018 - 7:44pm

हमे बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया इन रासायनिक खादों ने ऐसे शव्दों को न्यूट्रीवर्ड कम्पनी के डायरेक्टर  श्री गिरिजा कान्त सिंह जी ने ।उन्होंने फसल में लगातार बदने बाले उर्वरकों के प्रति चिन्ता जाहिर की उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों का  प्रयोग वर्ष प्रति वर्ष बढ़ता जा रहा है। उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशको का चलन हरित क्रांति में किया गया।हमारे प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन जी ने रासानिक खादों और संकर प्रजाति के बीजों की वकालत की। जिसकी  कीमत अव हमारे देश के किसान चुका रहे हैं ,उन्होंने साथ ही यूरिया के अंधाधुंध प्रयोग पर चिन्ता जाहिर की साथ ही उन्होंने यूरिया तथा अन्य रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से लेकर उससे होने वाली समस्या के बारे में बताया l

उन्होंने कहा कि किसानों द्वारा इस्तेमाल किए गए नाइट्रोजन से पौधे मात्र 30 फीसदी एफ यूरिया का उपयोग करते हैं। फसल की माँग से अधिक उपयोग में लाया गया नाइट्रोजन वाष्पीकरण और निष्टालन के जरिये खत्म हो जाता है। नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग जलवायु परिवर्तन और भूजल प्रदूषण को बढ़ावा देता है। यूरिया जमीन में रिस जाता है तथा नाइट्रोजन से मिलकर नाईट्रासोमाईन बनाता है जिससे दूषित पानी को पीने से कैंसर, रेड ब्लड कणों का कम होना और रसौलियाँ बनती हैं।उन्होंने डॉ आर के सिंह के एक कार्यक्रम का जिक्र भी किया जिसमें रासायनिक उर्वरकों के इतिहास के बारे में बताया गया था रासायनिक कृषि विनाश का नया आगाज

DAP खाद रॉक फास्फेट के रूप में मँगवाई जाती है जिसका शोधन कर इसमें से पी फास्फोरस प्राप्त किया जाता है। उन्होंने बताया कि शोधन के दौरान इसमें है, heavy element जैसे कोवाल्ट, कैडमियम और यूरेनियम आदि रह जाते हैं जिनके प्रयोग से मिट्टी तथा पानी दूषित होता है। मिट्टी की उर्वरता स्थिति में लगातार गिरावट हरित क्रांति की दूसरी पीढ़ी की सबसे गम्भीर समस्याओं में एक मानी जाती है। मिट्टी की उर्वरता स्थिति में गिरावट मुख्य रूप से सघन फसल प्रणालियों द्वारा पोषक तत्वों को हटाये जाने से आयी है जो पिछले कई दशकों के दौरान उर्वरकों एवं खादों के जरिये इतनी अधिक हो गयी है कि उनको फिर से भर पाना मुश्किल है। किसान अधिकतर नाइट्रोजन युक्त उर्वरक (ज्यादातर यूरिया) या नाइट्रोजन युक्त और मिश्रित जटिल उर्वक (ज्यादातर यूरिया या डीएपी) का उपयोग करते हैं तथा पोटाश और अन्य अभाव वाले पोषकों के उपयोग को नजर अन्दाज कर देते हैं। दूसरी तरफ, बहुपोषक तत्व की कमियाँ भी अधिकतर मिट्टियों में पहले ही उभर आई हैं तथा विस्तारित हो चुकी हैं। विभिन्न परियोजनाओं के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में किए गए मिट्टी यानि मृदा विश्लेषण से कम से कम 6 पोषक तत्वों-नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी), पोटाश (के) जिंक (जेडएन) और बोरॉन (बी) की व्यापक कमी प्रदर्शित हुई।

उत्तर-पश्चिमी भारत के चावल-गेहूँ उगाये जाने वाले क्षेत्रों में किए गये कुछ नैदानिक सर्वे से पता लगा कि किसान उपज स्तर को बनाये रखने के लिए, जिन्हें पहले कम उर्वरक उपयोग के जरिए भी हासिल कर लिया जाता था, अक्सर उचित दरों से ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग करते हैं। वैज्ञानिक निर्देशों के बावजूद नाइट्रोजन उर्वरकों में सबसे आम यूरिया का अन्धाधुन्ध उपयोग किया जाता है। यूरिया के अत्यधिक उपयोग का मिट्टी, फसल की गुणवत्ता और कुल पारिस्थितिकी प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एक फसल में यूरिया का प्रयोग कर अगली फसल के लिये इसकी जरूरत नहीं रहती लेकिन किसान गेहूँ की फसल को खाद देने के बाद इसे धान में भी प्रयोग करते हैं जबकि इसकी जरूरत नहीं होती। किसानों द्वारा साल में ज्यादा फसलें लेने के कारण फसलों की घनत्व 177 हो गई है। उर्वरता को बढ़ाने के लिए रूढ़ी की खाद, soil health program, फसल विविधिकरण तथा organic factor को बढ़ाना चाहिए। गेहूँ तथा धान को काटने के बाद बची हुई नाड को जलाने की बजाए मिट्टी में ही मिला देना चाहिए। जिसके लिए सरकार द्वारा किसानों सबसीडी दी जाती है। इससे कम खर्च में ज्यादा मुनाफा पाया जा सकता है।

यूरिया का असन्तुलित उपयोग नाइट्रोजन की कुशलता को घटा देता है जिससे उत्पादन की लागत में वृद्धि हो जाती है और शुद्ध मुनाफे में कमी आती है। अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग फसल के रसीलेपन को बढ़ा देता है जिससे पौधे बीमारियों और कीट संक्रमण के शिकार हो सकते हैं। यह मिट्टी के पोषक तत्वों, जिनका उपयोग नहीं किया गया है या पर्याप्त रूप से उपयोग नहीं किया गया है, के खनन को बढ़ाता है जिससे मृदा की उर्वरता में गिरावट आती है। ऐसी मिट्टियों को अधिकतम उपज देने के लिए भविष्य में अधिक उर्वरकों की जरूरत होगी। नाइट्रोजन एवं अन्य पोषक तत्वों की कुशलता, लाभप्रदत्ता और पर्यावरण सुरक्षा को बढ़ाने के लिए यूरिया के उपयोग को युक्तिसंगत बनाने की जरूरत है।

उन्होंने रासायनिक घटकों के साथ जैविक सूक्ष्म तत्वों का प्रयोग करने की वकालत की उन्होंने बताया कि उर्वरक यूरिया उपयोग का सन्तुलन न केवल फास्फोरस और पोटास के साथ किया जाना चाहिए बल्कि द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ भी किया जाना चाहिए न्यूट्रीवर्ड कम्पनी का साड़ा वीर,साड़ा वीर 4G, साड़ा वीर फर्राटा, साड़ा वीर स्प्रे का नियमित प्रयोग से फसल का उत्तम उत्पादन के साथ मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों में वर्द्धि होती है।

उन्होंने किसानों को मिट्टी परिक्षण के बाद ही अनुशासित उर्वरकों के प्रयोग की बात कही  साथ ही फसल चक्र का जिक्र और उसकी खूबियों के बारे में बताया । किसानों को सल्फर सूक्ष्म पोषण परीक्षण के लिए जोर देना चाहिए क्योंकि (सल्फर और सूक्ष्म पोषकों के बगैर) केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश अब सन्तुलित उर्वरक नुस्खा नहीं है। फसलों में फलियों तथा दालों का समावेश उर्वरक (यूरिया) की जरूरत में 25 से 50% तक की कमी ला सकता है। दाल के पौधे नाइट्रोजन को जमीन में रिसने से रोकते हैं फसल प्रणाली एवं सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर फलियों को अन्तवर्ती फसल हरित खाद, चारा, फसल या अल्पकालिक अनाज फसल के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। उचित फसल चक्र अपनाकर भी मृदा का उपजाऊपन बढ़ाया जा सकता है। फसल चक्र में खाद्यान्न फसलों के साथ दलहनी फसलों को भी उगाना चाहिये। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती है। साथ ही समृद्ध एवं टिकाऊ खेती के लिए मृदा में जीवांश पदार्थ की मात्रा को भी बढ़ाती हैं। भूमि के उपजाऊपन को बनाये रखने में जैविक कृषि विधियों का विशेष योगदान है। इसके अलावा खेत की तैयारी, फसल चक्र, कीट व रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव, समय से बुवाई, सस्य, भौतिक व यांत्रिक विधियों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण किया जा सकता है। मृदा के उपजाऊपन को बढ़ाने में एकीकृत कीट/व्याधि प्रबंध की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इसमें कीटनाशकों एवं शाकनाशियों के साथ हानिकारक जीवों व खरपतवारों को नियन्त्रित करने के लिए बायोएजेंट, बायोेपेस्टीसाइड, कृषि प्रणाली में बदलाव जैसे - शून्य जुताई व कम जुताई को अपनाकर भी मृदा की उर्वरा शक्ति में सुधार किया जा सकता है।इसी श्रखला में न्यूट्रीवर्ड कम्पनी का साड़ावीर, साड़ावीर 4G,  साड़ावीर फर्राटा,  साड़ावीर स्प्रे का नियमित प्रयोग से फसल का उत्तम उत्पादन के साथ मिट्टी में सूक्ष्म तत्वों में वर्द्धि होती है।

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गन्ना भुगतान में देरी के लिए सरकार के साथ रासायनिक कीटनाशक भी जिम्मेदार

9 July 2018 - 2:26pm

निजी हित के लिए बहुत सी कम्पनियाँ किसानों को गुमराह करतीं हैं।देश में किसानों की आर्थिक स्थिति से लेकर स्वास्थ्य समस्यायें बढ़ती जा रही हैं।सरकार और बैज्ञानिकों को अपनी जिम्मेदारी से किसानों के लिए काम करना चाहिए और साथ में किसानों को भी अपनी जागरूपता बढ़ानी होगी।

देश में किसानों की हालत गंभीर है।प्रतिवर्ष हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं।कारण किसानों पर कर्ज का दवाव।किसानों की सबसे बड़ी समस्या उनकी फसल का उत्पादन है किसान हजारों मुसीबत झेलते हुए फसल का उत्पादन करता है जिसमें अधिक तापमान, कम बारिश ,अधिक बारिश, बाढ़, तूफान आदि की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उसके बाद उसे जो उत्पादन मिलता है उसकी बिक्री बाजार की विकराल समस्या का सामना करना पड़ता है।

बाजार मिलने के बाद उसके उत्पादन मूल्य मिलना और समय से उस मूल्य का भुगतान यह सबसे बड़ी समस्या होती हैं। गन्ना किसानों के साथ भी किसानों की जानी मानी पुरानी समस्याओं का प्रकोप रहता है।चीनी मिलों की बेरुखी, सरकार का सौतेला व्यवहार के बाद भुगतान नहीँ। इस साल पिछली बार की तरह सरकार ने तुरन्त भुगतान की घोषणा की नतीजा शून्य बल्कि उससे भी बुरा। लेकिन इस तरह की समस्या क्यों आती हैं?

 मैंने इस बात पर क्रमबद्ध रूप से विचार किया और अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय निकाला कि सरकार के बाद सबसे बड़ी समस्या फसल में कीटनाशकों का मिलना है।विदेशों में हमारी चीनी की बिक्री नही हो पा रही है चीनी ही नही हमारे देश से विदेशों में जाने वाला खुशबु दार चावल जिसकी विदेशों में बहुत माँग रहती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कमी आयी है।क्योंकि हमारे उत्पादन में कीटनाशकों की मात्रा अधिक मिली ।विशेष रूप से खाद्यान्न उत्पादन में यह समस्या बड़ी है ,चीनी की माँग भी चीनी में खतरनाक कीटनाशक पाए जाने के कारण कमी आयी है जिसके कारण चीनी मिलों ने किसानों के भुगतान रोक दिये।

मुझे याद है कि किसानो के का एक कार्यक्रम में मैने कोराजन के खिलाफ बोला तो बहुत से किसान मुझसे असंतुष्ट हुये लेकिन अभी कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के चीनी एवं गन्ना आयुक्त ने भी इस बात को माना कि कोराजन का अत्यधिक प्रयोग खतरनाक है। 2012 में 2016 में पाकिस्तान जैसे देश ने हमारा टमाटर लेने से मना कर दिया हवाला कीटनाशक की मात्रा दिया नतीजा हमारे यहाँ किसानों को टमाटर सड़क पर फेंकना पड़ा। टमाटर ही नही प्याज,लहसुन,आलू ,व अन्य बहुत सी सब्जियों को सड़कों पर हम किसानों के द्वारा फेंक कर प्रदर्शन किये गए। यह स्थिति प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है जिसके लिएहम किसानों को अपने तरीके,उर्वरक और कीटनाशकों की बदलना होगा सरकार को भी नीतियाँ बदलनी होगी।कृषि आय की दुगना करने की घोषणा से कुछ नहीं होगा।अब कृषि क्षेत्र को उद्योग का दर्जा देना होगा। किसान हैल्प के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं जाने माने जैविक प्रचारक डॉ आर के सिंह के किसान बचाओ कार्यक्रम में विचार

जिरेनियम की खेती

3 July 2018 - 12:23pm

कम पानी और जंगली जानवरों से परेशान परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए जिरेनियम की खेती राहत देने वाली साबित हो सकती है। जिरेनियम कम पानी में आसानी से हो जाता है और इसे जंगली जानवरों से भी कोई नुकसान नहीं है। इसके साथ ही नए तरीके की खेती ‘जिरेनियम’ से उन्हें परंपरागत फसलों की अपेक्षा ज्यादा फायदा भी मिल सकता है। खासकर पहाड़ का मौसम इसकी खेती के लिए बेहद अनुकूल है। यह छोटी जोतों में भी हो जाती है। जिरेनियम पौधे की पत्तियों और तने से सुगंधित तेल निकलता है।

 

साधारण नाम जिरेनियम, रोज जिरेनियम वानस्पतिक नाम पेलार्गोनियम ग्रेवियोलेंस उन्नत किस्म सिम-पवन, बोरबन, सिमैप बयों जी-17।

प्रमुख रासायनिक घटक जिरेनियाल व एल-सिट्रोनेलाले।

 

जलवायु

जलवायु उपोष्ण, ठंड एवं शुष्क जलवायु। 25-30 डिग्री से तापक्रम एवं आर्द्रता 60% से कम अच्छी बढ़वार के लिये उपयुक्त।

 

लाभ

पहाड़ के ढलान वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त - कम पानी वाले क्षेत्रों में आसानी से खेती - बाजार में अत्यधिक मांग एवं उचित दाम - छोटी जोतों के लिए उपयुक्त यहां होता है उपयोग जिरेनियम के तेल में गुलाब के तेल जैसी खुशबू आती है। इसका प्रयोग साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, उच्च स्तरीय इत्र व तंबाकू के साथ ऐरोमाथिरेपी में किया जाता है।

 

भूमि

दोमट भूमि, पी.एच.-5.5-8.0, जीवांश पदार्थ की अधिकता एवं समुचित जल निकास की व्यवस्था वाली मृदा उपयुक्त रहती है। प्रवर्धन 12-15 सेमी. लम्बी, रोग मुक्त 3-4 गांठों वाली शाकीय कटिंग से पौधें तैयार किये जाते है।

 

खेत की तैयारी

पौध रोपण एवं भूमि खेत की अच्छी जुताई करने के पश्चात् उसमें सड़ी हुई 10-15 टन गोबर की खाद मिलाकर सुविधाजनक आकार की क्यारियों में रोपाई 50ग50 सेमी. की दूरी पर करनी चाहिए। जिरेनियम उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में नवम्बर से जनवरी के मध्य लगाते है।

 

खाद एवं उर्वरक

60 किग्रा. फास्फोरस, 40 किग्रा. पोटाश प्रति हे. के हिसाब से अन्तिम जुताई के समय मिला देना चाहिए। नत्रजन को तीन बार 50 किग्रा. प्रति हे. की दर से 20-25 दिन के अन्तराल पर डालना चाहिए। एक हे. में कुल 150 किग्रा. नत्रजन पड़ती है।

 

सिंचाई

फसल को 5-6 सिंचाई की आवष्कता पड़ती है।

कटाई

100-120 दिन की फसल होने के बाद कटाई करते है। दूसरी कटाई पहली कटाई के 60-90 दिनों के बाद करते है। ऊपर से 20-30 सेमी. तक केवल हरी शाखाओं को काटना चाहिए। कटाई के बाद कटे हुए पौधों पर ताँबायुक्त फफूँदी नाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

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